सोमवार, 16 सितंबर 2013

राम को रावण के रूप में और बाप को सांप के रूप में

क्रोध एक आंतरिक और मानसिक रोग 

क्रोध एक आंतरिक और मानसिक रोग है । क्रोध तृष्णा बढ़ाता है और धैर्य को नष्ट करता है एवं बुद्धि को भ्रष्ट करता है । क्रोध अवांछित एवं अवाच्य वचनों की प्रस्तुति करता है। साथ ही क्रोध पित्त-ज्वर का कारण भी बन जाता है । क्रोध हत्यारा बन प्रतिघात करता है । सात्विक भावों से दूर कर वह शत्रु के समान होजाता है । क्रोध निंदनीय एवं विष के समान ही घातक है .  

क्रोधी मनुष्य की आँखें इन्सान को शैतान के रूप में , भगवान को पाषाण के रूप में , मानव को दानव के रूप में , राम को रावण के रूप में और बाप को सांप के रूप में निहारती हैं । क्रोध की आग प्रतिशोध की अग्नि के समान है । 

आग पर घी डालोगे तो आग बढ़ेगी ही , क्रोध तो क्रोध से नहीं मिटेगा । हाँ , यह सत्य है कि क्रोध पर नियंत्रण करने से क्रोध मिट सकता है । ईंट का जवाब पत्थर से नहीं अपितु प्यार से देना चाहिए । अपना खुद का मकान यदि कांच का है तो दूसरे के मकान पर पत्थर मरना या अपने हाथ में पत्थर रखना खतरनाक सिद्ध हो सकता है । क्रोध में भद्दी-सी बोली , गाली या गोली , हत्या या खून की होली और लाशों की ही डोली उठ सकती है । इसके सिवाय और कोई दूसरा उपाय नहीं है ।

क्रोध के वातावरण से मुक्त होने के लिए जीवन और परिवेश के साथ-साथ भवनात्मक समत्व के आत्मसात करने की आवश्यकता है । आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से स्थिति से स्थापित कए जाने वाला साम्यवाद यदि हमारे व्यवहार में आ जाये तो इससे जीवन में क्रांति भी हो सकती है । जो आचरण हम अपने प्रतिकूल समझते हैं उस आचरण को दूसरे के साथ भी नहीं करना चाहिए। श्रुति का वचन है _ ' आत्मन: प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत ' ।

जब-जब व्यक्ति की अपेक्षा _ उपेक्षा में बदलती है , तब-तब क्रोध का वातावरण बनता है। क्रोध न पनपे इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्ति अपनी अपेक्षाएं दूसरों के बजाय अपने पास रखे वह व्यक्ति साधना के मार्ग पर कदम नहीं बढ़ा पायेगा , जो किसी कटु शब्द सुनने का सामर्थ्य अपने ह्रदय में नहीं रखता है ।************


भय उत्पन्न करने में सर्प का प्रतिबिम्ब

क्रोध के कारण मनुष्य पागल हो जाता है 

क्रोध के कारण मनुष्य पागल हो जाता है और इतना पागल कि वह अपने वास्तविक स्वरूप को ही भूल जाता है । वस्तु की यथार्थता उसकी दृष्टि से लुप्त हो जाती है । वस्तुत: मनुष्य क्रोध के वशीभूत कुक्कुर -वृत्ति का हो जाता है। जिस प्रकार कुत्ता दूसरे कुत्ते को सहन नहीं कर पाता , उसी प्रकार क्रोधी मनुष्य का भी स्वभाव होता है। कुत्ता जैसे कुत्ते को देखकर भौंकता है उसी प्रकार क्रोधी भी दूसरे मनुष्य क्रोधी बना देता है और वे परस्पर क्रोध का व्यवहार करते हैं । जैसे कोई कुत्ते को लाठी मारता है तो वह दूम हिलाते हुवे लाठी को चाटने लगता है । परन्तु सिंह लाठी की ओर नहीं अपितु लाठी मारने वाले की ओर ही झपटता है । विवेकी मनुष्य की दृष्टि सिंह की तरह होती है और क्रोधी व्यक्ति की दृष्टि कुत्ते की तरह होती है । एक मूल कारण को दूर करने का प्रयास करता है और दूसरा मूल कारण को समझ ही नहीं पाता है ।


सामान्यत: हम देखते हैं कि बीच सड़क पर किसी ने किसी को गोली मार दी और वह घायल हो गया , तब उसके साथ जो उसके घरवाले या मित्र लोग होते हैं तो वे गोली मारने वाले का पीछा करने लगते हैं पर उस घायल व्यक्ति को अनदेखा कर लेते हैं । मान लो कि यदि गोली मारने वाला अगर मिल भी जाये तो लाभ क्या होगा ? आपको लाभ होगा घायल व्यक्ति के बचाने पर । लेकिन क्रोध ऐसा नहीं करने देता । जब क्रोध विराजमान होगा , तब वहां विवेक टिक ही नहीं पायेगा ।


क्रोध विचार उत्पन्न करने में मदिरा का मित्र है , भय उत्पन्न करने में सर्प का प्रतिबिम्ब है । दूसरों को तथा अपने को जलाने में क्रोध अग्नि का सहोदर है। कुत्ते में एक आदत और होती है , वह है _ ईर्ष्या , जलन और गुर्राने की । एक गली का कुत्ता अगर दूसरी गली में आ जाये , तो पहली गली वाला कुत्ता उसे भौंक-भौंक कर भगा देता है । जैसे दुष्ट प्रकृति वाला शिष्ट प्रकृति वाले से , कामी सत्चरित्र से , चोर स्वभावगत जागने वाले से , पापी धर्मात्मा से , भीरु शूरवीर से , कवि कवि से , रसोइया रसोइया से , वैद्य वैद्य से , ब्राह्मण ब्राह्मण से , विद्वान् विद्वान् से , राजा राजा को देखकर गुर्राने लगते हैं , वैसे ही क्रोधी व्यक्ति करुणावान को देखकर उन पर कुपित होता है ।

क्रोध के आवेग के कारण शरीर के भीतर ऐसे अनेक रसायन उत्पन्न हो जाते हैं , जिनकी तुलना में सांप का विष भी कम मारक होता है । क्योंकि सांप के मुंह में एक थैली होती है , जिसमें उसका सारा विष इकट्ठा रहता है । लेकिन मनुष्य के शरीर में ऐसी कोई थैली नहीं होती , अत: क्रोध के समय में मनुष्य के शरीर में पैदा हुवा क्रोधरूपी जहर उसकी समस्त नस-नाड़ियों में फैल जाता है । जैसे आग से दाह ही पैदा होता है और विष पीने से मृत्यु ही होती है ; उसी प्रकार क्रोध से तनाव एवं अशांति ही पैदा होती है । कहा भी गया है _ ' चाहते हो जीवन में शांति । तो क्रोध को वश में करो । तुम्हारे ही क्रोध ने , तुम्हें बर्बाद कर डाला । '#######



कोई मिट जाये ; लेकिन जीतना जरूरी

खुद मिटो या कोई मिट जाये ; लेकिन जीतना जरूरी 


अहंकार का मूल क्रोध है । अहंकार के कारण ही व्यक्ति क्रोध के भाव से भरा रहता है । जीत हराने से ही नहीं प्राप्त की जाती , अपितु जीत कभी हारने से भी प्राप्त होती है । यह मनुष्य को मालूम ही नहीं है । और यह जीत उसको मिलती है , जो हार जाता है एवं जो लड़ता ही नहीं है । वह साम्य-भाव धारण करके मौन हो जाता है । इसका किसी को कुछ भी पता नहीं है । और उसे मालूम भी नहीं हो सकता , क्योंकि उसके चित्त की पूरी की पूरी प्रकृति आक्रामक ( एग्रेसिव ) है । उसका एक ही ख्याल है , दबो या दबाओ , हारो या जीतो ; चाहे जीतने की दौड़ में कुछ भी हो जाये ; खुद मिटो या कोई मिट जाये ; लेकिन जीतना जरूरी है ।


क्रोध विधायक नहीं अपितु विध्वंसक है । क्रोध कल्याणकारी नहीं अपितु क्लेशकारी है । क्रोध प्रभावना नहीं अपितु अवमानना है । क्रोध विरक्ति नहीं अपितु आसक्ति है । क्रोध क्षमा नहीं अपितु घृणा है । क्रोध सृष्टि नहीं अपितु संहार है । क्रोध उन्नति नहीं अपितु अवनति है । क्रोध आरोह नहीं अपितु अवरोह है । क्रोध चिन्मय नहीं अपितु मृनमय है ।

आज जितने भी सम्प्रदाय बने हैं , वे सभी अपनी-अपनी संतुष्टि के लिए ही हैं । अपने अहंकार की पुष्टि के लिए व्यक्ति क्रोध करता है तथा अन्य सम्प्रदाय के प्रति उसमें क्रोध का भाव सदा बना रहता है । क्रोध के विषय में कहा गया है _ ' क्रोधो हि शत्रु: प्रथमो नराणां , देह स्थितो , देह विनाश हेतु : । अग्निर्यथा काष्ठागतो अपि गूढ़: , स एव काष्ठं दह्तीह नित्यम । ' अर्थात इस प्रकार है कि मनुष्य का सबसे पहला और सबसे बड़ा शत्रु है तो वह क्रोध है । क्योंकि वह शरीर में स्थित होता हुवा हि शरीर के नाश का कारण है । उदाहरण के लिए जैसे अग्नि काष्ठ या लकड़ी में स्थित होकर छिपी रहती है और वही इस संसार में निरंतर काष्ठ को ही जलाती है । यह तो वैसी स्थिति हो गयी जैसे की अपने मकान में रझा गया किरायेदार हमारा ही मकान मालिक बनकर कोर्ट में मुकदमा जीत जाता है ; तथा वह हमें अपना किरायेदार भी बनाना भी पसंद नहीं करता । हमारा तो वह पूर्ण रूप से निष्कासन ही चाहता है ।

क्रोध भी मनुष्य के स्वभाव के कारण परिवर्तित रहता है । उत्तम मनुष्य का क्रोध क्षण भर ठहरता है । जैसे जब सूरज जब उदयाचल से निकलता है , तो निस्तेज होता है । वही सूर्य दोपहर में आग-सी जलन पैदा करता है और अस्त होते समय पुन: शीतल होने लगता है । उत्तम मनुष्य भी कभी - कभी किसी जीव के हित में सुधार करने के लिए अपना थोड़ा-सा रूप बदलता है । मध्यम मनुष्य का क्रोध दो प्रहर ठहरता है । नीच पुरुष का क्रोध दिन-रत ठहरता है । मनो पक्की गाँठ बंध गयी हो या पत्थर पर लकीर खींच दी गयी हो । इस सन्दर्भ में कहा गया है _ ' उत्तमस्य क्षणं कोपो , मध्यमस्य प्रहरद्वयं । अधमस्य तु अहोरात्रं , पापिष्ठस्य सदा भवेत ॥ '@@@@

उतरता है क्रोध कमजोर की ओर ही

क्रोध कमजोर की ओर ही उतरता है  


क्रोध बुद्धि को खा जाता है और वह बुद्धि का पूर्ण रूप से अपहरण कर लेता है । क्रोध और वासना सबसे पहले प्रहार बुद्धि पर करती है । यह ध्यान देने की बात है कि जैसे पानी ऊपर की ओर नहीं चढ़ता तो ऐसे भी क्रोध भी ऊपर की ओर नहीं चढ़ता । पानी भी नीचे की ओर उतरता है और क्रोध भी नीचे की ओर ही उतरता है । क्रोध कमजोर की ओर ही उतरता है । क्रोध अपने से बड़े की ओर नहीं चढ़ सकता । जिस प्रकार पानी को चढ़ाने के लिए मशीन की आवश्यकता होती है , उसी प्रकार क्रोध को ऊपर चढ़ाने के लिए भी अत्यधिक बाह्य कारण की आवश्यकता पड़ती है ।

क्रोध में व्यक्ति अपने होश खो बैठता है । व्यक्ति का सम्पूर्ण होश चूक जाता है ओर वह बेहोशी का-सा कार्य करने लगता है । क्रोध की अवस्था में व्यक्ति दूसरों के साथ स्वयं अपने को भी भला -बुरा कहने लगता है । क्रोध से युक्त मस्त गीदड़ सिंह पर क्रोध करे तो सिंह पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? निर्बल व्यक्ति यदि बहुत भारी पहलवान पर क्रोध करे तो क्या लाभ होगा ? क्रोध का कारण कुछ भी रहा हो , पर वह साधारण ही होता है ओर इसका प्रमाण यह है कि प्राय: क्रोध करने वाला व्यक्ति क्रोध शांत होने पर पश्चाताप से भरा हुवा या माफ़ी मांगता नजर आता है । अत: व्यर्थ में क्रोध न कर बुद्धि से काम लेना चाहिए ।

मदिरा के एक प्याले से शरीर की जितनी हानि पहुँचती है , उससे कहीं अधिक क्रोध के कारण होती है । किसी भी काम से चरित्र में इतनी कमजोरी नहीं आती , जितनी क्रोध के कारण आती है । क्रोध का पागलपन मानव को अँधा बना देता है । अपेक्षा जब उपेक्षा में बदलती है तो क्रोध आ जाता है । ऐसे समय आवश्यकता है आत्म-संयम ओर आत्म-नियंत्रण की । क्रोध के कारण मानव की शक्तियाँ समाप्त होने लगती हैं । मनुष्य अपनी कार्य-शक्ति और तर्क-शक्ति को खो बैठता है । स्मरण -शक्ति और धैर्य तक क्रोध के कारण लुप्त हो जाते हैं । क्रोध के विषय में कहा गया है _ ' नास्ति क्रोध समं पापं , नास्ति क्रोध समं रिपु: । क्रोधो मूलं अनर्थानाम , तस्मात क्रोधं विवर्जयेत ॥ '

हमें क्रोध न करके उसके साथ समझौता कर अपने आत्म-संयम और आत्म-निर्णय को सुदृढ़ करें । मन को क्रोध द्वारा दूषित न होने दें । छोटी-छोटी बातों पर नहीं भड़कना नहीं चाहिए । स्वयं सोचना और विचार करना चाहिए तथा साथ ही जड़ से क्रोध को उखाड़ फेंकने का प्रयास करना चाहिए । ########


युद्ध तब तक विश्व में अनिवार्य है

मगर जब उठ रहीं चिंगारियां , भिन्न -भिन्न स्वार्थों के कुलिश संघर्ष की , युद्ध तब तक विश्व में अनिवार्य है 

भारत की स्वाधीनता से पूर्व हम अपने स्वराज्य के बड़े रंगीन सपने संजोया करते थे । सोचते थे कि स्वाधीन भारत एक बार फिर सारे संसार का पथ प्रदर्शक बनेगा । भारत के ऋषियों के प्रति वह निष्ठा अब तक भी संसार के समस्त विचारकों की रही है । एक विदेशी प्रसिद्ध विद्वान् ने विश्व शांति सम्मेलन के अध्यक्ष पद से बोलते हुवे कहा था _ ' अरे ! भू-मंडल के समस्त विद्वानों ! यदि आप संसार के वायु -मंडल को क्षोभ-रहित और शांत रखना चाहते हो तो भारत के वनों और गुफाओं में तप करते हुवे महात्माओं की सेवा में जाओ और उनके चरणों में बैठकर उनके पवित्र मुख से जो विचार सुनो , उनका प्रचार एवं प्रसार योरोप और अमेरिका में करो । तब संसार में शांति हो सकती है ।

भारत की अपनी निजी विशेषता है । यहाँ पुरुषार्थी ही वीर है और वीर ही पुरुषार्थी है । सामान्यतया शूर और वीर पर्यायवाची समझे जाते हैं । किन्तु विशेषत: अर्थ को देखते हुवे दोनों में अंतर है । शूर शब्द हिन्सार्थक ' श्री ' धातु से बना है , अत: यह शब्द उस सैनिक का वाचक है , जो आदेश पर गोली चला देता है । सोचना -विचारना उसका काम नहीं । किन्तु वीर शब्द गत्यर्थक ' वीर ' धातु से बना है , अत: सेना का सम्पूर्ण नीति -निर्धारण पूर्वक युद्ध करना आदि वीर कि सीमा में आती हैं । श्रुति में ' वीर भोग्य वसुंधरा ' के विषय में कहा गया है । वीर वही है जो युद्ध भी न्याय-पूर्वक करे । वैदिक नारी या माता की घोषणा है कि _ ' मम पुत्र: शत्रु हणो: अथो मे दुहिता विराट ' अर्थात मेरे पुत्र इतने सशक्त हों कि वे एक सच्चे वीर के समान शत्रुओं का वध करने वाले हों तथा मेरी पुत्रियाँ भी मेरे समान ही दिव्य एवं विराट गुणों से युक्त सन्तान को उत्पन्न कर सके ।

वसूं अर्थात ऐश्वर्य को धारण करने वाली वसुंधरा ही वीरों की थाती है । वीरता ही पुरुषों का आभूषण माना गया है। सच्चा वीर जन-कल्याण के भाव को समक्ष रख कर ही कार्य करता है । वीर शब्द विशेषत: पंजाब में भाई के लिए ही प्रयुक्त होता है । इससे स्पष्ट होता है कि भाई को वीर होना ही चाहिए और हर वीर ही भाई है । वीर ही मुखिया होता है और मुखिया मुख के जैसा होना चाहिए । जो भी वह ग्रहण करे तो उसका वितरण करे , अपने मुख में रख कर ही नहीं बैठ जाना चाहिए । और वह तन के सभी अंगों का पालन-पोषण करे । दिनकर की ये पंक्तियाँ बिलकुल ही सटीक हैं ' युद्ध को तुम निन्द्य कहते हो , मगर जब उठ रहीं चिंगारियां , भिन्न -भिन्न स्वार्थों के कुलिश संघर्ष की , युद्ध तब तक विश्व में अनिवार्य है। '

साथ ही वीरता के साथ पुरुषार्थी भी होना आवश्यक है । जो पूरी शक्ति से परिश्रम नहीं करते , उन्हें लक्ष्मी नहीं मिलती । आलसी मनुष्य पापी होता है । भगवान परिश्रम करने वालों को मित्र बनाता है । इसलिए श्रम करना चाहिए । चलने वाले की जंघाएँ सशक्त होती हैं , जो सफलता मिलने तक काम में जुटे रहते हैं ; उनकी आत्मा प्रतिभा-सम्पन्न होती है । परिश्रमी मनुष्य की समस्त त्रुटियाँ मार्ग में स्वत: समाप्त हो जाती हैं ।

बैठने वाले का भाग्य भी बैठ जाता है , और जो खड़ा हो जाता है तो उसका भाग्य भी खड़ा हो जाता है । तथा जो सो जाते हैं तो उनका भाग्य भी सो जाता है । साथ ही जो चलने लगते हैं तो उनका भाग्य भी चलने लगता है । सोने वालों के लिए सदा ही कलियुग है । जिन्होंने श्रम करने का विचार कर लिया , उसके लिए द्वापर प्रारम्भ हो गया । जो कर्म करने के लिए खड़े हो गये उनके लिए त्रेता आ गया और जिन्होंने काम करना प्रारम्भ कर दिया उनके लिए सतयुग आ गया _ ' कलि: शयानो भवति , संजिहान्स्तु द्वापर: । उत्तिष्ठाम त्रेता भवति कृतं सम्पद्यते चरम ॥ '

महर्षि स्वामी दयानन्द ने पुरुषार्थ की महत्ता व्यक्त करते हुवे कहा है _' पुरुषार्थ प्रारब्द्ध से बड़ा इस लिए है कि जिससे संचित प्रारब्द्ध बनते हैं , जिसके सुधरने से सब सुधरते हैं और जिसके बिगड़ने से सब बिगड़ते हैं । इसी सेप्रारब्ध की अपेक्षा पुरुषार्थ बड़ा है ।&&&&&&&&&&



बदल जाता दृष्टिकोण दृष्टि के बदलते ही

 दृष्टि के बदलते ही दृष्टिकोण भी बदल जाता है  


वेद में प्रभु को यज्ञ के नाम से पुकारा गया है । उसके द्वारा निर्मित यह संसार ही यज्ञ रूप है । उसके इस विशाल संसार में हमारा जीवन रूपी यज्ञ उसी ने रचा है और जो वर्ष तक चलने वाला है । हमारी योग्यता इसी में है कि हम इस शरीर से कोई यज्ञीय कार्य न करें । श्रुति के अनुसार _ ' अष्टचक्रा नवद्वारा देवाना पूरयोध्या ' अर्थात यह आठ चक्र और नौ द्वार वाली हमारी शरीर रूपी देवपुरी है । हमें अपनी सभी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से जो जानें और करें वह यज्ञरूप ही हो । सभी कार्य व्यक्ति और समाज की भलाई के लिए ही हों । साथ ही उत्तम विचार और आचार के इतने अभ्यस्त हो जाएँ कि सम्पूर्ण दिव्य भाव हमारे अंग ही बन जाएँ ।

यजुर्वेद में ' यज्ञेन कल्पताम ' और ' कल्पन्ताम ' की प्रार्थना है । इसके अंतर्गत _ ' आयु: यज्ञेन कल्पताम , प्राणो कल्पताम , चक्षु: यज्ञेन कल्पताम , श्रोत्रं यज्ञेन कल्पताम , वाक् यज्ञेन कल्पताम , मनो यज्ञेन कल्पताम , आत्मा यज्ञेन कल्पताम , ब्रह्मा यज्ञेन कल्पताम , ज्योति: यज्ञेन कल्पताम । ' सार यह है कि मनुष्य का समस्त क्रिया-कलाप यज्ञमय होना चाहिए । हम चक्षु के प्रकाश से दूसरों को मार्ग दिखाएँ । हम इनकी सहायता से ज्ञान का उपार्जन करके अपना और दूसरों का कल्याण करें । ' मुखं च वाचा श्रोत्रेण जुहोमि ' _ हम मुख में निवास करने वाली वाणी से तथा उसमें स्थित कानों से यज्ञमय ही बन जाएँ । हम वाणी से मधुर -वचन ही बोलें ।

पर-निंदा राक्षसी-वृत्ति है । राक्षस तो यज्ञ का विध्वंस करते हैं । समाज और घर निंदा एवं चुगली से उजड़ जाते हैं । निंदा की गंदगी पसंद करना काक -वृत्ति है । कहा गया है _ ' न बिना परिवादेन दुर्जनो रमते जन: । काक: सर्व रसान भुन्क्त्ते बिना मेध्यन्न त्रिष्यती । ' अर्थात बुरा व्यक्ति जबतक दूसरों की निंदा न कर ले तबतक उसे शांति नहीं मिलती । कौवा चाहे कितना ही मधुर भोजन कर ले , किन्तु जबतक वह अपनी चोंच गंदगी में न डुबोये तो उसको तृप्ति नहीं होगी . वाणी से पर-निंदा न करना बहुत बड़ा दैवी गुण है ।

जहाँ जीवन सत्य है वहां मृत्यु भी शास्वत सत्य ही है । भिव्यक्ति के एक रूप का नाम जीवन है तो दूसरे रूप का नाम मृत्यु है । संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि हम प्रतिदिन मृत्यु की ओर अग्रसर हो रहे हैं , पर हमें इस पर विश्वास ही नहीं होता । व्यक्ति यह सोचता है कि दूसरा मरता है , पर वह अमर है । यह भ्रम ही उसे संसारिकता में बांधे रहता है । यदि हम अपने जीवन को यज्ञमय बना लें तो बहुत कुछ परिवर्तित हो सकता है । दृष्टि के बदलते ही दृष्टिकोण भी बदल जाता है । जिस प्रकार नजर के बदलते ही नजारा भी बदल जाता है । कल्याणमय जीवन ही यज्ञीय जीवन है । स्वार्थ को समाप्त करके ही सर्वार्थ भावना को अपनाना होगा ।*******

रविवार, 15 सितंबर 2013

कोई भी क्रोध की अवस्था में स्वस्थ चित्त नहीं


 कोई भी क्रोध की अवस्था में स्वस्थ चित्त नहीं रह सकता 




अन्तरंग में क्रोध कल्मष का उदय और बाह्य में दूसरों के द्वारा कुवचन सुनकर क्रोध का उदय होता है । क्रोधी की भौंहें टेढ़ी हो जाती हैं और आँखें चढ़ जाती हैं । भय उत्पन्न हो जाता है और शोक की वृद्धि होती है । साथ ही वैर -द्वेष का भाव अत्यधिक बढ़ जाता है । जिस प्रकार बबूल के वृक्ष में पानी व खाद देने से वह वृद्धि को प्राप्त होकर कांटे ही कांटे उत्पन्न करता है । उसी प्रकार क्रोधी जीव के राग और द्वेष के मिलने से वैर और शोक दोनों ही बढ़ जाते हैं । दया , क्षमा , सुशील आदि स्वगुण नष्ट हो जाते हैं ।

अस्तु , क्रोध माँ-बाप , भाई -बहन , पिता-पुत्र कोई रिश्ता नहीं देखता । वह तो अपनी आग बुझाना चाहता है । एक रूप से क्रोध चांडाल के समान है । दुश्चरित्र और दुराचार में लीन रहना क्रोधी का मुख्य आधार है। चांडाल तो भोग-उपभोग में कुछ रूचि भी लेता है । जीवन में कभी-कभी सत्य वचन भी बोल देता है और हिंसा आदि कार्यों में प्रवृत्त होने पर भी अपने जीवन एवं जीविका को नष्ट नहीं करता । परन्तु क्रोधी मनुष्य तो चांडाल से भी ऊपर है ; क्योंकि उसे भोजन भी अच्छा नहीं लगता । क्रोधी की बुद्धि नष्ट हो जाने से हित-अहित के विचे से शून्य होता हुवा असत्य भाषण व कुवचनों का बार-बार लज्जारहित होकर प्रयोग करता है ।

अस्तु , क्रोध का जन्म हिंसा की भावना से होता है और इसका अंत पश्चाताप में होता है । क्रोध और विवेक , एक दूसरे के उतने ही विरोधी हैं , जितने कि प्रकाश और अंधकार । क्रोध की स्थिति में मनुष्य पागल जैसा हो जाता है और क्योंकि पागल विवेकहीन होता है तथा विवेकहीन व्यक्ति ही क्रोध करने का पागलपन कर सकता है । क्रोध से व्याकुल मनुष्य न बोलने योग्य भाषा को बोल पाता है और न करने योग्य क्रिया को कर पाता है । जिस प्रकार अग्नि अपने उत्पादक काष्ठ को जलाकर ही शांत होती है । ठीक ऐसे ही क्रोध भी अपने आधारभूत पुरुष को नष्ट करके ही शांत होता है ।

जिस प्रकार अपथ्य सेवन करने वाले रोगी का औषध -सेवन करना निष्फल हो जाता है ; उसी प्रकार क्रोधी मनुष्य की समाधि , शास्त्र-ज्ञान और संयम निष्फल हो जाते हैं । कोई भी क्रोध की अवस्था में स्वस्थ चित्त नहीं रह सकता । जब वह स्वस्थ चित्त नहीं होगा , तब दया नहीं होगी । परिणामत: अहिंसा -धर्म का पालन भी सम्भव नहीं है । यदि कोई क्रोध करता है और हम मुस्कुरा कर क्षमा मांग लेते हैं , यानि उसे बड़ा मान लिया तो वह क्रुद्ध नहीं होगा । अत: यह स्पष्ट है कि मात्र क्रोध करने से ही हमें कितने दोष आ जाते हैं । वास्तव में अवगुणों के बिना क्रोध करना भी सम्भव ही नहीं है । व्यक्ति सर्वप्रथम अपनी प्रतिष्ठा की चिंता करता है और साथ ही वह अपने को सर्वोपरि मानकर कार्य करता है । जब उसकी प्रतिष्ठा का हनन होता है तो वह क्रोध से आपूरित हो जाता है । क्रोध का प्रादुर्भाव ही नहीं होने देना चाहिए और इस पर नियंत्रण से अनेक समस्याओं का समाधान हो जाता है । %%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%