कोई भी क्रोध की अवस्था में स्वस्थ चित्त नहीं रह सकता
अन्तरंग में क्रोध कल्मष का उदय और बाह्य में दूसरों के द्वारा कुवचन सुनकर क्रोध का उदय होता है । क्रोधी की भौंहें टेढ़ी हो जाती हैं और आँखें चढ़ जाती हैं । भय उत्पन्न हो जाता है और शोक की वृद्धि होती है । साथ ही वैर -द्वेष का भाव अत्यधिक बढ़ जाता है । जिस प्रकार बबूल के वृक्ष में पानी व खाद देने से वह वृद्धि को प्राप्त होकर कांटे ही कांटे उत्पन्न करता है । उसी प्रकार क्रोधी जीव के राग और द्वेष के मिलने से वैर और शोक दोनों ही बढ़ जाते हैं । दया , क्षमा , सुशील आदि स्वगुण नष्ट हो जाते हैं ।
अस्तु , क्रोध माँ-बाप , भाई -बहन , पिता-पुत्र कोई रिश्ता नहीं देखता । वह तो अपनी आग बुझाना चाहता है । एक रूप से क्रोध चांडाल के समान है । दुश्चरित्र और दुराचार में लीन रहना क्रोधी का मुख्य आधार है। चांडाल तो भोग-उपभोग में कुछ रूचि भी लेता है । जीवन में कभी-कभी सत्य वचन भी बोल देता है और हिंसा आदि कार्यों में प्रवृत्त होने पर भी अपने जीवन एवं जीविका को नष्ट नहीं करता । परन्तु क्रोधी मनुष्य तो चांडाल से भी ऊपर है ; क्योंकि उसे भोजन भी अच्छा नहीं लगता । क्रोधी की बुद्धि नष्ट हो जाने से हित-अहित के विचे से शून्य होता हुवा असत्य भाषण व कुवचनों का बार-बार लज्जारहित होकर प्रयोग करता है ।
अस्तु , क्रोध का जन्म हिंसा की भावना से होता है और इसका अंत पश्चाताप में होता है । क्रोध और विवेक , एक दूसरे के उतने ही विरोधी हैं , जितने कि प्रकाश और अंधकार । क्रोध की स्थिति में मनुष्य पागल जैसा हो जाता है और क्योंकि पागल विवेकहीन होता है तथा विवेकहीन व्यक्ति ही क्रोध करने का पागलपन कर सकता है । क्रोध से व्याकुल मनुष्य न बोलने योग्य भाषा को बोल पाता है और न करने योग्य क्रिया को कर पाता है । जिस प्रकार अग्नि अपने उत्पादक काष्ठ को जलाकर ही शांत होती है । ठीक ऐसे ही क्रोध भी अपने आधारभूत पुरुष को नष्ट करके ही शांत होता है ।
जिस प्रकार अपथ्य सेवन करने वाले रोगी का औषध -सेवन करना निष्फल हो जाता है ; उसी प्रकार क्रोधी मनुष्य की समाधि , शास्त्र-ज्ञान और संयम निष्फल हो जाते हैं । कोई भी क्रोध की अवस्था में स्वस्थ चित्त नहीं रह सकता । जब वह स्वस्थ चित्त नहीं होगा , तब दया नहीं होगी । परिणामत: अहिंसा -धर्म का पालन भी सम्भव नहीं है । यदि कोई क्रोध करता है और हम मुस्कुरा कर क्षमा मांग लेते हैं , यानि उसे बड़ा मान लिया तो वह क्रुद्ध नहीं होगा । अत: यह स्पष्ट है कि मात्र क्रोध करने से ही हमें कितने दोष आ जाते हैं । वास्तव में अवगुणों के बिना क्रोध करना भी सम्भव ही नहीं है । व्यक्ति सर्वप्रथम अपनी प्रतिष्ठा की चिंता करता है और साथ ही वह अपने को सर्वोपरि मानकर कार्य करता है । जब उसकी प्रतिष्ठा का हनन होता है तो वह क्रोध से आपूरित हो जाता है । क्रोध का प्रादुर्भाव ही नहीं होने देना चाहिए और इस पर नियंत्रण से अनेक समस्याओं का समाधान हो जाता है । %%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%%




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