सोमवार, 16 सितंबर 2013

बदल जाता दृष्टिकोण दृष्टि के बदलते ही

 दृष्टि के बदलते ही दृष्टिकोण भी बदल जाता है  


वेद में प्रभु को यज्ञ के नाम से पुकारा गया है । उसके द्वारा निर्मित यह संसार ही यज्ञ रूप है । उसके इस विशाल संसार में हमारा जीवन रूपी यज्ञ उसी ने रचा है और जो वर्ष तक चलने वाला है । हमारी योग्यता इसी में है कि हम इस शरीर से कोई यज्ञीय कार्य न करें । श्रुति के अनुसार _ ' अष्टचक्रा नवद्वारा देवाना पूरयोध्या ' अर्थात यह आठ चक्र और नौ द्वार वाली हमारी शरीर रूपी देवपुरी है । हमें अपनी सभी ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों से जो जानें और करें वह यज्ञरूप ही हो । सभी कार्य व्यक्ति और समाज की भलाई के लिए ही हों । साथ ही उत्तम विचार और आचार के इतने अभ्यस्त हो जाएँ कि सम्पूर्ण दिव्य भाव हमारे अंग ही बन जाएँ ।

यजुर्वेद में ' यज्ञेन कल्पताम ' और ' कल्पन्ताम ' की प्रार्थना है । इसके अंतर्गत _ ' आयु: यज्ञेन कल्पताम , प्राणो कल्पताम , चक्षु: यज्ञेन कल्पताम , श्रोत्रं यज्ञेन कल्पताम , वाक् यज्ञेन कल्पताम , मनो यज्ञेन कल्पताम , आत्मा यज्ञेन कल्पताम , ब्रह्मा यज्ञेन कल्पताम , ज्योति: यज्ञेन कल्पताम । ' सार यह है कि मनुष्य का समस्त क्रिया-कलाप यज्ञमय होना चाहिए । हम चक्षु के प्रकाश से दूसरों को मार्ग दिखाएँ । हम इनकी सहायता से ज्ञान का उपार्जन करके अपना और दूसरों का कल्याण करें । ' मुखं च वाचा श्रोत्रेण जुहोमि ' _ हम मुख में निवास करने वाली वाणी से तथा उसमें स्थित कानों से यज्ञमय ही बन जाएँ । हम वाणी से मधुर -वचन ही बोलें ।

पर-निंदा राक्षसी-वृत्ति है । राक्षस तो यज्ञ का विध्वंस करते हैं । समाज और घर निंदा एवं चुगली से उजड़ जाते हैं । निंदा की गंदगी पसंद करना काक -वृत्ति है । कहा गया है _ ' न बिना परिवादेन दुर्जनो रमते जन: । काक: सर्व रसान भुन्क्त्ते बिना मेध्यन्न त्रिष्यती । ' अर्थात बुरा व्यक्ति जबतक दूसरों की निंदा न कर ले तबतक उसे शांति नहीं मिलती । कौवा चाहे कितना ही मधुर भोजन कर ले , किन्तु जबतक वह अपनी चोंच गंदगी में न डुबोये तो उसको तृप्ति नहीं होगी . वाणी से पर-निंदा न करना बहुत बड़ा दैवी गुण है ।

जहाँ जीवन सत्य है वहां मृत्यु भी शास्वत सत्य ही है । भिव्यक्ति के एक रूप का नाम जीवन है तो दूसरे रूप का नाम मृत्यु है । संसार का सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि हम प्रतिदिन मृत्यु की ओर अग्रसर हो रहे हैं , पर हमें इस पर विश्वास ही नहीं होता । व्यक्ति यह सोचता है कि दूसरा मरता है , पर वह अमर है । यह भ्रम ही उसे संसारिकता में बांधे रहता है । यदि हम अपने जीवन को यज्ञमय बना लें तो बहुत कुछ परिवर्तित हो सकता है । दृष्टि के बदलते ही दृष्टिकोण भी बदल जाता है । जिस प्रकार नजर के बदलते ही नजारा भी बदल जाता है । कल्याणमय जीवन ही यज्ञीय जीवन है । स्वार्थ को समाप्त करके ही सर्वार्थ भावना को अपनाना होगा ।*******

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