खुद मिटो या कोई मिट जाये ; लेकिन जीतना जरूरी
अहंकार का मूल क्रोध है । अहंकार के कारण ही व्यक्ति क्रोध के भाव से भरा रहता है । जीत हराने से ही नहीं प्राप्त की जाती , अपितु जीत कभी हारने से भी प्राप्त होती है । यह मनुष्य को मालूम ही नहीं है । और यह जीत उसको मिलती है , जो हार जाता है एवं जो लड़ता ही नहीं है । वह साम्य-भाव धारण करके मौन हो जाता है । इसका किसी को कुछ भी पता नहीं है । और उसे मालूम भी नहीं हो सकता , क्योंकि उसके चित्त की पूरी की पूरी प्रकृति आक्रामक ( एग्रेसिव ) है । उसका एक ही ख्याल है , दबो या दबाओ , हारो या जीतो ; चाहे जीतने की दौड़ में कुछ भी हो जाये ; खुद मिटो या कोई मिट जाये ; लेकिन जीतना जरूरी है ।
अहंकार का मूल क्रोध है । अहंकार के कारण ही व्यक्ति क्रोध के भाव से भरा रहता है । जीत हराने से ही नहीं प्राप्त की जाती , अपितु जीत कभी हारने से भी प्राप्त होती है । यह मनुष्य को मालूम ही नहीं है । और यह जीत उसको मिलती है , जो हार जाता है एवं जो लड़ता ही नहीं है । वह साम्य-भाव धारण करके मौन हो जाता है । इसका किसी को कुछ भी पता नहीं है । और उसे मालूम भी नहीं हो सकता , क्योंकि उसके चित्त की पूरी की पूरी प्रकृति आक्रामक ( एग्रेसिव ) है । उसका एक ही ख्याल है , दबो या दबाओ , हारो या जीतो ; चाहे जीतने की दौड़ में कुछ भी हो जाये ; खुद मिटो या कोई मिट जाये ; लेकिन जीतना जरूरी है ।
आज जितने भी सम्प्रदाय बने हैं , वे सभी अपनी-अपनी संतुष्टि के लिए ही हैं । अपने अहंकार की पुष्टि के लिए व्यक्ति क्रोध करता है तथा अन्य सम्प्रदाय के प्रति उसमें क्रोध का भाव सदा बना रहता है । क्रोध के विषय में कहा गया है _ ' क्रोधो हि शत्रु: प्रथमो नराणां , देह स्थितो , देह विनाश हेतु : । अग्निर्यथा काष्ठागतो अपि गूढ़: , स एव काष्ठं दह्तीह नित्यम । ' अर्थात इस प्रकार है कि मनुष्य का सबसे पहला और सबसे बड़ा शत्रु है तो वह क्रोध है । क्योंकि वह शरीर में स्थित होता हुवा हि शरीर के नाश का कारण है । उदाहरण के लिए जैसे अग्नि काष्ठ या लकड़ी में स्थित होकर छिपी रहती है और वही इस संसार में निरंतर काष्ठ को ही जलाती है । यह तो वैसी स्थिति हो गयी जैसे की अपने मकान में रझा गया किरायेदार हमारा ही मकान मालिक बनकर कोर्ट में मुकदमा जीत जाता है ; तथा वह हमें अपना किरायेदार भी बनाना भी पसंद नहीं करता । हमारा तो वह पूर्ण रूप से निष्कासन ही चाहता है ।
क्रोध भी मनुष्य के स्वभाव के कारण परिवर्तित रहता है । उत्तम मनुष्य का क्रोध क्षण भर ठहरता है । जैसे जब सूरज जब उदयाचल से निकलता है , तो निस्तेज होता है । वही सूर्य दोपहर में आग-सी जलन पैदा करता है और अस्त होते समय पुन: शीतल होने लगता है । उत्तम मनुष्य भी कभी - कभी किसी जीव के हित में सुधार करने के लिए अपना थोड़ा-सा रूप बदलता है । मध्यम मनुष्य का क्रोध दो प्रहर ठहरता है । नीच पुरुष का क्रोध दिन-रत ठहरता है । मनो पक्की गाँठ बंध गयी हो या पत्थर पर लकीर खींच दी गयी हो । इस सन्दर्भ में कहा गया है _ ' उत्तमस्य क्षणं कोपो , मध्यमस्य प्रहरद्वयं । अधमस्य तु अहोरात्रं , पापिष्ठस्य सदा भवेत ॥ '@@@@





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