सोमवार, 4 नवंबर 2013

खुशबु हवा के साथ फ़ैल कर सब जगह छा जाती है

खुशबु का साक्षात् सम्बन्ध नासिका अर्थात प्राण- तत्त्व से है  


खुशबू सुगंध का पर्यायवाची है, यश, कीर्ति एवं वैभव को विस्तारित करने वाला है। इसको सौरभ और और महक के नाम से भी जाना जाता है। एक कवि ने कहा है--"व्याकुल उस मधु सौरभ से मलयानिल धीरे - धीरे "। खुशबू को आंसू भी कहा गया है ; क्योंकि आंसू भी मन के भाव को अभिव्यक्त करने का एक साधन है। आंसू के माध्यम से व्यक्ति अपने दुःख को संयोजित कर अपनी संवेदना को प्रशस्त कर अक्षय कीर्ति का संभागी बनता है।
क्योंकि आंसू भी एक करुणा का ही रूप है । वह अपने भाव को सामाजिक समरसता प्रदान करता है। खुशबु को केसर भी कहा जाता है । केसर जहाँ सुगंध का वाची है , वहां वह रंग में प्रेम , सात्विकता और बलिदान का सूचक है। इसके साथ-साथ यह आध्यात्मिकता में परम- प्रिय ईश्वर के संयोग का भी प्रतीक है। आम को भी खुशबु का प्रतीक माना गया है। आम का वृक्ष धार्मिक दृष्टि से जहाँ पवित्र माना गया है ; वहां इसके पत्तों का बन्दनवार में प्रयोग किया जाता है। धार्मिक अनुष्ठान में इसके प्रयोग के पीछे प्रमुख कारण यह है कि इस वृक्ष पर कभी भी पतझढ़ नहीं आता।

 यह प्रकृति का अद्भुत उपहार है। सदैव खिलने वाला यह वृक्ष प्रकृति की खुशबु का श्रृंगार है। छंद - रचना में सौरभ एक वर्ण -वृत्त है ; जिसमें वेदों कि अनेक रचनाओं का विस्तार हुवा है। वस्तुत: सौरभ एक विविध आयामी शब्द - योजना है। यह प्रकृति के सार- तत्त्व को प्रस्तुत करता है। सौरभ से अपने मन की खुशबु को विस्तारित किया जा सकता है। 




खुशबु का साक्षात् सम्बन्ध नासिका अर्थात प्राण- तत्त्व से है। इसी प्राण- योजना को महा-प्राण से संयोजित कर खुशबु - युक्त बनाया जा सकता है। खुशबु हवा के साथ फ़ैल कर सब जगह छा जाती है , वह अपने कुल - गौरव के साथ - साथ सभी को आल्हादित एवं प्रसन्न - चित्त करती है। खुशबु सभी को भाती है। वास्तव में बस खुशबु मात्र खुशबु ही है।*******************************



हमारा उद्देश्य उपवन लगाना है , जंगल नहीं

कारण रूप बीज से कार्य रूप वृक्ष का पूर्णत: सम्बन्ध - विच्छेद नहीं कराया जा सकता 



अधिकारी ,विषय , सम्बन्ध और प्रयोजन -- इन प्रश्नों को सामने रख कर जो विचार किया जाता है , वह अनुबंध चतुष्टय है । अधिकारी के सम्बन्ध में उस युग में विचार किया जाता था , जब ग्रन्थ बाजार में नहीं बिकते थे । वे इस बात का भी ध्यान रखते थे कि ग्रन्थ का दुरूपयोग न हो। हीन व्यक्तियों को सद्विद्या देना इसीलिए वर्जित था कि विद्या से बड़ी हुई उसकी बुद्धि -शक्ति अधिक - से- अधिक अनर्थ करने वाली बन जाएगी , मानो बन्दर को आग पैदा करने की कला का ज्ञान हो गया । 

बुद्धि स्वयं में एक अजेय शक्ति मात्र है। वह जिस रंग में रहेगी उसी में काम करेगी -- वह न तो बुरी है और न भली। बिजली की शक्ति भारी मशीनों को चलाती है , तो स्वयं ताप भी पैदा करती है। वह बर्फ भी जमा देती है , तो प्रकाश भी देती है। वह स्वयं कुछ भी नहीं है , यही हाल बुद्धि का भी मानना चाहिए । आज के वातारण में , जबकि संपर्क स्थापन के कारणों और सुविधाओं की विपुलता है, सारी दुनिया एक दूसरे के बहुत निकट खिसकती चली आ रही है। तब यह सोचना व्यर्थ ही होगा कि मिश्रण - दोष में अनियंत्रित वृद्धि नहीं हो रही है।

अब तो यह विभाजन भी असंभव - सा हो गया है। ऐसी स्थिति में अधिकारी और अनधिकारी के प्रश्न पर विचार करने का प्रयास करना बुद्धि - व्यभिचार मात्र है -- या तो सभी अधिकारी हैं या सभी अनधिकारी। अब विषय पर विचार करना चाहिए। हमें उस आर्य जाती के जीवन- दर्शन पर ही विचार करना होगा। जिसने इस पवित्र भू - भाग को अपनी श्रेष्ठता के कारण ' आर्यावर्त ' नाम दिया था -- " आर्य ईश्वरपुत्र:" । आर्य शब्द में ' ऋ ' धातु है , जो श्रेष्ठ और गति दोनों अर्थों में है। आर्य यदि श्रेष्ठ तो वे स्थिर नहीं अपितु गतिशील थे। सभी क्षेत्रों में उनकी सम गति थी।

 श्रेष्ठत्व का वरण जन्म के आधार पर नहीं किया जा सकता , यह तो कर्म - सापेक्ष है। जन्मना श्रेष्ठ कहे जाने की भावना तब फैली होगी जब किसी वर्ग - विशेष के मानव स्वभावत: श्रेष्ठ होते थे , किन्तु उस वर्ग के भीतर ऐसे गुणों का विकास युगों की कठिन साधना की सिद्धि के कारण ही हुवा होगा , अनायास नहीं । अपने शील , शौर्य , दाक्षिण्य आदि गुणों के कारण आर्य जाति ने आर्य शब्द को जो गौरव प्रदान किया , वह आश्चर्यजनक है । एक ऐसी जाति का , जो प्रकाश की ओर बढ़ने का प्रयास कर रही है और अपने शुभ प्रयास के सुखद परिणाम की झलक प्रत्येक पग पर प्राप्त कर रही है , जीवन -दर्शन कैसा हो सकता है , यह एक विचारणीय विषय है । 

दो अंतों के बीच में ही जीवन के स्पंदन का अनुभव किया जा सकता है। हम उन विचारों से सम्बन्ध स्थापित करना चाहेंगे , जिनके कारण आर्य आज तक सुनियोजित स्थिति पर हैं । आचार के प्राण विचार होते हैं , विकारों के तेज से आचारों की शुद्धता को बल मिलता है । कल्याण के मार्ग पर चलने की कामना -- ' स्वस्ति पन्थामनुचरेम' ही आर्यत्व है । प्रयोजन है विचारों के माध्यम से कुछ ऐसे तथ्यों को समेट कर उन्हें घनत्व प्रदान करना , जो सम्भवत: अपने स्वरूप के नहीं रहने के कारण बिखर से गये हैं। कारण रूप बीज से कार्य रूप वृक्ष का पूर्णत: सम्बन्ध - विच्छेद नहीं कराया जा सकता । 

कारण कार्य के रूप में बदल जाता है , जैसे शब्द अर्थ के रूप में बदल जाता है ; फिर भी शब्द का अस्तित्व तो रहता ही है उस अर्थ के रूप में । यही हाल किसी जाति के विकास का है । जब प्रयोजन को सामने रखते हैं तो अभिप्राय स्पष्ट हो जाता है। उसी तरह जीवन के अनुभवों में से चुन कर, अपने अभिप्राय के अनुसार , एक क्रम से सजाना होगा , तभी एक पूर्ण तथा स्पष्ट चित्र उभर सकेगा। कहने का तात्पर्य यह है कि आर्य- जीवन -दर्शन को स्पष्ट करने के लिए इसी पद्धति को अपनाना उचित समझा गया है। साथ ही हमारा उद्देश्य उपवन लगाना है , जंगल नहीं। हमें सोने का अलंकार पहनना है , सोने की सिल्ली गले में लटकाना नहीं चाहते। 

जो कुछ भी है वह सब प्रभु - प्रेरणा है , शाश्वत रूप में वही कर्माध्यक्ष है। यश- अ यश उसी का है ; अपना कुछ भी नहीं है। ईश्वर को अंतर और बाहर उपस्थित जानकर ही व्यवहार किया जा सकता है । महर्षि व्यास के शब्दों में -- " सर्व: सर्वां न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्चन । नैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित॥ "****


प्रणव का प्रथम घोष किसी वन - प्रदेश में ही

ज्ञानमयी विद्या का नाम सरस्वती 




ज्ञान त्रिविध -- अध्यात्म, अधिभूत और अधिदैवत 
होता है । यही त्रिपथगा गंगा है । इसी में सभी प्रकार का ज्ञान समाहित है । इसी ज्ञानमयी विद्या का नाम सरस्वती है । यह विद्या पवित्र करने वाली है , शरीर ,मन और बुद्धि की शुद्धता इसी विद्या से प्राप्त होती है।

 विद्या अन्न देने वाली तथा भरण - पोषण करने वाली है । पोषण करने के कारण यह बल देने वाली भी है । विद्या से बुद्धि का विकास होता है तथा बुद्धि - विकास से जो कर्म किए जाते हैं , वे उत्तम कर्म होते हैं । इन उत्तम कर्मों के माध्यम से यही विद्या धन भी प्रदान करती है । सत्य द्वारा उत्पन्न होने वाले विशेष महत्त्वपूर्ण कर्मों की प्रेरणा भी इसी विद्या से मिलती है ।

 यह विद्या ज्ञान का प्रसार करने के कारण कर्मों के महा- सागर को ज्ञानी के सामने स्पष्ट कर देती है । वैदिक ऋषियों ने ऐसी जीवन व्यापिनी विद्या का अर्जन करना जीवन का महत्त्वपूर्ण कर्त्तव्य माना । इन्हीं सारी बातों को ध्यान में रख कर इस कार्य को अपने अधिकार में रखा । विद्या- दान का कार्य वे ही करते थे , जो स्वयं आचारमय एवं विद्वान् होते थे । पात्र ही विद्या ग्रहण करते थे ।

 आचार्य और शिष्य दोनों में असाधारणता का रहना आवश्यक था , और जिस वातावरण में यह ज्ञान -यज्ञ अनवरत रूप से होता था ; वह आचार्य का आश्रम कोलाहल से दूर , वन की गोद में अत्यंत शांत वातावरण में होता था । वैदिक भाषा में वन और वानप्रस्थ का अत्यधिक महत्त्व है। अंग्रेजी में यह निन्दावाचक 'जंगली ' के रूप में है । हमारी संस्कृति में ' वनवासी ' शब्द अत्यंत गौरवपूर्ण अर्थ ग्रहण करता है। वैदिक सभ्यता का विकास और संरक्षण वनवासी ऋषियों , विचारकों एवं आचार्यों से होता रहा है।प्रणव का प्रथम घोष किसी वन - प्रदेश में ही हुवा होगा । ज्ञान-गंगा की अनेक सतत धाराएं शांत मनोरम वन -प्रदेश से ही विस्तारित हुई होंगी । 


वैदिक शिक्षा - पद्धति का मूल तत्त्व शिष्यों का आचार्य - कुल में रह कर ज्ञान प्राप्त करना था । वहां सभी के साथ एक समान व्यवहार किया जाता था , चाहे राजकुमार हो या सामान्य व्यक्ति 'विद्याधिगमे षट्तीर्थानि ' अर्थात शिक्षा प्राप्त करने के अधिकारी थे -- शिष्य , वेदाध्यायी, धारणा -शक्ति सम्पन्न व्यक्ति , धन द्वारा आश्रम का संरक्षण करने वाला , पुत्र तथा एक विद्या सीख कर दूसरी विद्या सीखने वाला ।

 आचार्य और आश्रम की सेवा करना भी विद्यार्थी का कर्त्तव्य होता था , आचार्य की भिक्षा लाना , अग्नि-परिचर्या , घर का काम , गौ-सेवा , यज्ञ की समिधा लाना आदि। आचार्य उपनयन-संस्कार करके एक नये जीवन में ब्रह्मचारी का प्रवेश कराता है, इसे नया जन्म कहते हैं , इसी जन्म के कारण ही वह द्विज कहलाता है । यह माता-पिता से मिले हुवे स्थूल शरीर से भिन्न होता है। ज्ञान और चेतना की गोद में पुनर्जन्म होता है और अंत में मुक्ति की शांति में जब हम प्रवेश करते हैं तो शाश्वत सूक्ष्म शरीर प्राप्त होता है । यह सूक्ष्म शरीर जन्म , जरा , रोग , सुख-दुःख , लाभ-हानि ,मरण आदि सबसे ऊपर होता है। 

विद्यार्थी तेज , वीर्य , बलओजस्विता , मन्यु और प्रतिकूलताओं पर विजय पाने के लिए समर्थ-शक्ति प्राप्त करने की प्रार्थना करता था । क्योंकि जीवन को विकसित और उन्नत बनाने के लिए उपर्युक्त गुणों की पर्याप्त आवश्यकता मानी गयी है । इन उदात्त भावनाओं को जीवन में आचरित करने के लिए विद्यार्थी आचार्य - कुल में जाते थे । साथ ही वे ब्रह्मचर्य आदि द्वारा आत्म- नियंत्रण से सर्वथा योग्य बनाते थे । वे तेज , बल, वीर्य , ओज आदि से संयुक्त हो गृहस्थाश्रम में प्रवेश करते थे , इसी से समाज का ठोस गठन होता था ।

 भारतीयों का शिक्षा - सम्बन्धी विचार या गठन उनके जीवन - सम्बन्धी विचार और गठन के अनुरूप ही था । ऐसा नहीं था कि दोनों विरोधी दिशाओं में प्रवाहित हों । जैसा कि आधुनिक जीवन में हो रहा है कि न तो जीवन को शिक्षा स्पर्श कर पा रही है और न ही शिक्षा जीवन को पभावित कर पा रही है।&&&&&&&&&&&


ज्ञान से ही मुक्ति संभव है।

जो अपूर्ण है , वह स्वावलंबन की कामना कर ही नहीं सकता 




हमारे भीतर जो मुक्ति का एवं स्वतंत्रता का वेग है , उसका स्पष्ट कारण यही है कि इसमें ऐसा तत्त्व प्रधान रूप से सजग है , जो पूर्णत: स्वतंत्र है। मुक्ति एवं स्वतंत्रता की तीव्र आकांक्षा उसी तत्त्व के हमारे भीतर रहने का प्रमाण है ; किन्तु हम जो शारीरिक पराधीनता और असमर्थता पूर्ण दासता के शिकार हो जाते हैं वह इस बात का द्योतक है कि निर्माण की दृष्टि से हम पूर्णता तक नहीं पहुंचे हैं। 

जो अपूर्ण है , वह स्वावलंबन की कामना कर ही नहीं सकता । उसे सदा दूसरों की ओर ही देखना होगा । प्रकृति का निर्माणात्मक कार्य अभी पूर्ण वेग से गतिशील है ओर हम भी विकासात्मक अवस्था के भीतर ही हैं । जिस अंश तक हम अपूर्ण , दुर्बल ओर पराधीन हैं, उस अंश तक हम दास ओर उससे भी गिरे हुवे हैं । 

यह भी सोचना है कि जिसने अविद्या के कारण शरीर ओर आत्मा के भेद को सही- सही जानकर अपने को आत्मस्थ नहीं किया वह शरीर अनुरागी है । शरीर अनुरागी होने का अर्थ है कायानुपश्यी बन जाना तथा इस शरीर को ही सबकुछ मान बैठना। ऐसे को आत्मघ्न' कहा जाता है। ये आत्मघ्न सदा पराधीन तो रहते ही हैं तथा अपने भीतर की शक्तियों का भी सम्यक पोषण नहीं कर पाते। 

अपूर्ण जगत और शरीर पर आश्रित होने का परिणाम है पराश्रित रहना , क्योंकि जहाँ अपूर्णता है , वहीँ निर्बलता है पर जहाँ निर्बलता है वहीँ दूसरों की अपेक्षा है-- ' नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो ।  मेधया न बहुना श्रुतेन॥ ' यह आत्मा न तो प्रवचन से प्राप्त होता है और न बुद्धि से तथा न शास्त्रों के लगातार श्रवण से ही उपलब्ध होता है। 

अंतत: यह आत्मा कैसे प्राप्त होता है ? इसी मंत्र में आगे स्पष्ट किया गया है--- ' यमेवैष 
वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष। आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम ॥ ' अर्थात जो इस आत्मा को स्वीकार करता है उसे ही प्राप्त होता है । उसके लिए अपना स्वरूप प्रकट करता है। आत्म-चेतना में ही नैतिक स्वतंत्रता निहित है , न कि कायापश्यी बन जाने में

 मानव अन्य पशुओं से उच्च है , क्योंकि वह अपने विषय में सोच पाता है। अपने को सही- सही जानना यह बहुत बड़ी साधना है। वस्तुत: वह है क्या ? इसका बोध होना ही ' आत्म- बोध' है। भ्रान्ति रहित बोध को ही ' आत्मस्थ ' कहा जाता है। क्षणस्थायी शरीर से भिन्न अपनी शाश्वत स्थिति का जब हमें पूर्ण ज्ञान हो जाता है तब हम बाहर की पराधीनता और भीतर के बन्धनों से सर्वथा मुक्त हो जाते हैं। 

आंतरिक मुक्ति का जब बाह्य प्रकटीकरण होता है तब हमें सच्ची स्वतंत्रता का दर्शन होता है , जो अमृत - तुल्य है। वास्तव में बाह्य स्वतंत्रता की पूर्णता आंतरिक मुक्ति पर निर्भर करती है और जब तक शुद्ध ज्ञान का उदय नहीं होता तब तक आंतरिक मुक्ति किसी भी अन्य उपाय से सम्भव नहीं है। बिना अंतर की मुक्ति के बाहर की स्वतंत्रता फलप्रद हो हो नहीं सकती। मानव या तो आत्मनिष्ठ रहे या भोगनिष्ठ बने , जिस अंश तक वह आत्मनिष्ठ नहीं है , उसी अंश तक वह भोगनिष्ठ है। यदि हम पूर्णत: आत्मनिष्ठ नहीं हैं तो हमारा जीवन- क्रम पशुत्व की ओर ही विकास करने लगेगा।

 जीवन द्रव्य के समान है , द्रव्य पर क्रिया का जैसा कर्म होगा उसका भविष्य भी वैसा ही बनता जायेगा। इसी प्रकार भोगनिष्ठ जीवन पर किया कर्म ' पशु ' बनने का है। तो किसी भी रूप में यह स्वीकार नहीं किया जा सकता कि वह अंत में ' देवता ' बन जायेगा। इसलिए गीता में कहा गया है कि -- अपना उद्धार अपने आप ही करें , अपने को कभी भी गिरने न दें। क्योंकि स्वयं मानव अपना बन्धु भी है ओर शत्रु भी है।

जिसने अपने आप को जीत लिया , वह स्वयं अपना बन्धु है , परन्तु जो अपने आप को नहीं पहचानता वह स्वयं अपना शत्रु है-- " उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मन:॥ " इस स्वतंत्रता एवं मुक्ति के लिए शुद्ध ज्ञान की आवश्यकता है ओर उस ज्ञान को जीवन के प्रत्येक स्पंदन में प्रतिबिंबित होना चाहिए न कि केवल वाचक- ज्ञान अथवा मौखिक ज्ञान में। यजुर्वेद के अनुसार जो अज्ञान की उपासना एवं अविद्या का सेवन करते हैं वे तो घोर तम में प्रवेश करते ही हैं , और जो कोरे ज्ञान में रत हैं वे भी घनघोर अंधकार में पड़ जाते हैं --- " अन्धन्तम: प्रविशन्ति येअविद्यामुपासते । ततो भूय ते तमो य उ विद्यायां रता:॥ " 

ज्ञान और अज्ञान का भेद करके ऋषि ने समझाया है। अविद्या से मृत्यु प्राप्त होती है और विद्या तो साक्षात् अमृत है ही। यजुर्वेद के अनुसार -- " विद्यां चाविद्यां च यस्त्द्वेदो भयं सह। अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्याया अम्रतमश्नुते॥  " ज्ञान और अज्ञान , विद्या और अविद्या अमृत एवं मृत्यु कहा गया है। अज्ञान- ग्रस्त रह कर मुक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती। मुक्ति तो भीतर से उभरती है और हमारे सम्पूर्ण जीवन को अपने विस्तार के भीतर ले लेती है। यह मुक्ति ज्ञान का उदय है और इसका फल है अज्ञान का पूर्णत: नाश। जिस अंश तक हम ज्ञान - आश्रित हैं उसी अंश तक मुक्त हैं , जिस अंश तक अज्ञान - ग्रस्त हैं उसी अंश तक बन्धनों में पड़े हैं। पूर्ण ज्ञान- आश्रयी होने का अर्थ है पूर्ण मुक्त हो जाना ; भीतर से भी मुक्त और बाहर से भी मुक्त। अस्तु , ज्ञान से ही मुक्ति संभव है।***************************************************

शुक्रवार, 1 नवंबर 2013

वैदिकों का आराध्य देव ईश्वर

निर्गुण ब्रह्म और सगुण ईश्वर दोनों का विचित्र मेल 



समस्त प्राणियों में स्थित एक देव है। वह सर्व व्यापक , समस्त भूतों की अंतरात्मा , कर्मों का अधिष्ठाता , सभी प्राणियों में निवासित , सब का साक्षी , शुद्ध , चेतन एवं निर्गुण है। श्वेताश्वतरोपनिषद का यह मंत्र अत्यंत महत्त्वपूर्ण है -

 " एको देवसर्वभूतेशु गूढ़ : सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा  कर्माध्यक्ष : सर्वभूताधिवाससाक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च: " इस मंत्र में १० रूप हैं -- १ एको , २ सर्वभूतेषु गूढ़:, ३ सर्व व्यापी , ४ सर्व भूतान्तारात्मा , ५ कर्माध्यक्ष: , ६ सर्वभूताधिवास: , ७ साक्षी , ८ चेता , ९ केवल: , १० निर्गुणश्च । प्रस्तुत मंत्र में संख्या का प्रारंभ १ से होता है। ९ पूर्णांक है और नौवीं संख्या' केवल ' है तथा दसवीं संख्या ' निर्गुण ' है , जिसका गुणन नहीं हो सकता , वह शून्य है तथा मंत्र के अंत में ' निर्गुण ' शब्द आया है। शून्य स्वतनिर्गुण है। ऊपर वाले एक पर अंत वाले निर्गुण शून्य को बैठा देने से १० संख्या स्वत: बन जाती है। ९ पूर्ण इसलिए है कि वह जहाँ भी रहता है , अपने स्वरूप का त्याग नहीं करता , अत: ' केवल ' है ; जैसे -- ९+९ = १८ हुवा, १+८=९ । इसी तरह ९ का पूर्ण है तथा ' केवल' है। इस मंत्र में निर्गुण ब्रह्म और सगुण ईश्वर दोनों का विचित्र मेल है। आदि में वह एक था और अंत में सब कुछ अपने भीतर समेट कर एक भी नहीं रहा, शून्य बन गया -- निर्गुण बन गया। संख्या - धारण करने का तात्पर्य सीमित बनना होता है। वह ईश्वर एक है ,किन्तु दो, तीन, चार, पांच आदि नहीं है। 

यह वैदिकों का आराध्य देव ईश्वर है , जिसकी कोई प्रतिमा नहीं हो सकती , वह ध्यान में नहीं आ सकता ; क्योंकि निराकार को देखा नहीं जा सकता --- दृष्टि को रूप - रंग चाहिए , किन्तु वह रूप और रंग से रहित है--- यजुर्वेद के अनुसार -- "  तस्य प्रतिमा अस्ति यस्य नाम महद यश: " । ऋग्वेद के अनुसार एक ही मूल तत्त्व को विद्वान् अग्नि , यम , मातरिश्वा आदि नामों से पुकारते हैं ---" एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्त्यग्नि यमं मातारिश्वनामाहु: " । 


गीता में स्वयं श्री कृष्ण ने भी यही कहा है कि वे ही सब कुछ हैं -- जल में रस , सूर्य - चन्द्र में प्रकाश , सभी वेदों में ओंकार , आकाश में शब्द , पुरुषों में पराक्रम , पृथ्वी में गंध , अग्नि में तेज , प्राणिमात्र में जीवन , तपस्वियों का तप आदि। जब वह अपने ही भीतर ही स्थित है तब उसे हम जान क्यों नहीं पाते। यजुर्वेद के ऋषि का मत है कि वह सर्वत्र ओत-प्रोत है , सूर्य की तरह प्रकाशमान है , किन्तु अज्ञान के अंधकार के कारण उसे देख नहीं पाते। उसे जान लें तो मृत्यु से छुटकारा ही मिल जाये। अमृतत्त्व प्राप्त करने का अन्य कोई दूसरा उपाय भी तो नहीं है-- नान्यपन्था विद्यते अयनाय " ।

देहाध्यास यदि समाप्त हो जाये तो फिर वही ईश्वर शेष रह जाता है , जो सबका कारण है पर उसका कोई कारण नहीं है। अन्य सभी वस्तु मृत्यु में क्षर-प्रधान हैं। उन्हें भी कभी- न - कभी उस ' निर्गुण ' में विलीन होना ही पड़ेगा ऋषियों के विचार ईश्वर अर्थात मूल- तत्त्व को जान लेने से मृत्यु की सम्भावना सदा के लिए समाप्त हो जाती है। ईश्वर हमारे भीतर है और सर्वत्र भी है। आसान तो यही होगा कि जो ईश्वर हमारे भीतर है उसी को हम जान लें -- दूर - दूर चौकड़ी भरने से क्या लाभ ? वैदिकों ने ईश्वर को अपने भीतर जाना और उस आत्म्पुरुष को जानने के लिए केवल चार उपायों का आश्रय लेने का परामर्श ऋषियों ने दिया। ईश्वर को जान लेना ही अध्यास का अत्यन्ताभाव होना है और अध्यास का अत्यन्ताभाव हुवा नहीं कि अभेद भावना पैदा ही गयी -- कुंठा का अंत हुवा तो यह शरीर ही वैकुण्ठ बन गया , जिसमें आत्मपुरुष स्थित है। यह आत्मा - आत्मपुरुष पठन- पाठन से , बुद्धि से , शास्त्रों से पाप्त नहीं होता। साधक जिस आत्मा का वरण करता है , प्रार्थना करता है , उस वरण करने वाले आत्मा द्वारा यह आत्मा स्वयं ही प्राप्त किया जाता है ; अर्थात उसे ही 'यह ऐसा है ' इस प्रकार जाना जाता है---नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो  मेधया  बहुना श्रुतेन ।

 यमेवैष वृणुते तेन लभ्य्स्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूंस्वां ॥ " ईस्वर और अपने भीतर ईश्वर की कल्पना ऋषियों की चमत्कारपूर्ण रचना है। जिससे इस जगत के जन्मादि अर्थात -- उत्पत्ति , स्थिति और प्रलय होते हैं , वही ब्रह्म है। मानदूक्योपनिषद में कहा गया है कि  आत्मा  विज्ञेय: " वही आत्मा है , वही जानने योग्य है। ऋषियों ने चिंतन की अंतिम चोटी पर पहुँच कर पता पा लिया कि वह एक ही देव है , जो सब कुछ है और कुछ भी नहीं है। वही कारण- रूप है , वह आत्मपुरुष है , वही हमारे भीतर है। वह जहाँ भी है , पूर्ण है खंड नहीं है --- अणु में भी और विश्व्ब्रह्मांड में भी। उस पूर्ण का प्रत्येक अंश पूर्ण है और फिर भी वह पूर्ण ही है। वैदिकों ने ईश्वर
को निश्चय ही अनेक रूपों में देखा और समझा , किन्तु उनकी यह अनेकता भी अज्ञानमूलक नहीं कही जा सकती। कार्य-भेद से एक ही व्यक्ति अपने ही घर में पिता , पति , श्वशुर , पितामह , स्वामी सब कुछ है, किन्तु न तो वह व्यक्तिश: अलग मानकर अनेक थालों में भोजन करता है और न एक साथ दस - बीस खाटों पर ही सोता है , वह मरता भी एक बार ही है। अत: ईश्वर सत्ता रूप में एक ही है।
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मन जितना शांत होता है ,करवटें भी उतनी ही कम

देह की चंचलता मन की चंचलता का बोध   



कायोत्सर्ग का अर्थ है-- चैतन्य के जागरण के साथ ही शरीर का उत्सर्ग। तथागत बुद्ध जब सोते तो रात भर करवट नहीं बदलते थे। मूल बात यह है कि मन जितना शांत होता है ,करवटें भी उतनी ही कम बदलनी पडती हैं। अशांत मन वाले व्यक्ति रात भर करवट बदलते रहते हैं। एकरूप से मनुष्य की अशांत स्थिति ही उसके शरीर की चंचलता में अभिव्यक्त होती है। 

मनुष्य का मन जैसे-जैसे शांत होगा , वैसे -वैसे उसका शरीर भी स्थिर होगा। देह की चंचलता मन की चंचलता का बोध कराती है । ध्यान के माध्यम से जब मन एकाग्र और स्थिर होता है , तो शरीर की चंचलता स्वत: दूर हो जाती है।

 ध्यान साधना साधना में मन और शरीर का गहरा अनुबंध है। मन चंचल तो शरीर चंचल , मन स्थिर तो शरीर स्थिर हो जाता है। मन की स्थिरता मन की निमित्त बनती है। ध्यान- साधक के कायिक स्थिरता की साधना आवश्यक है। उसका उपाय है-- कायोत्सर्ग । इसे कायिक ध्यान भी कह सकते हैं।

 कायोत्सर्ग का प्रायोगिक रूप है-- शिथिलीकरण, श्वास को शांत करना , शरीर की चेष्टाओं को विसर्जित करना और मन को पूर्णत: रिक्त कर देना। कायोत्सर्ग ध्यान की अनिवार्य भूमिका है। क्योंकि काया की स्थिरता के बिना मन की स्थिरता उपलब्ध नहीं होती। मन को स्थिर करने के लिए श्वास की स्थिरता और श्वास की स्थिरता के लिए शरीर की स्थिरता परम आवश्यक है।

 इसलिए ध्यान के आधारभूत तत्त्वों में कायोत्सर्ग का पहला स्थान है, अर्थात काया की स्थिरता का है। शारीरिक दृष्टि से कायोत्सर्ग नींद की अपेक्षा अधिक विश्रामदायक है। तनाव से उत्पन्न होने वाली मनोदैहिक बीमारियों को मिटाने का यह निर्दोष उपाय है। आध्यात्मिक दृष्टि से कायोत्सर्ग सफल प्रयोग है। देहाध्यास से मुक्त होने का कायोत्सर्ग विशिष्ट सरल एवं सफल साधन कहा जा सकता है ।************************