बुधवार, 30 अक्टूबर 2013

सम्पत्ति को बटोरने के स्थान पर बाँटने का प्रयास

अपरिग्रह से तात्पर्य कम से कम ग्रहण करना 


अपरिग्रह से तात्पर्य कम से कम ग्रहण करना है। शब्द , स्पर्श , रूप , रस, गंध आदि किसी भी भोग - सामग्री का संग्रह न करना ही अपरिग्रह है। आवश्यकता से अधिक जीवन की उपयोगी वस्तुओं का संग्रहण नहीं करना चाहिए। साथ ही मालिक का भाव भी नहीं आना चाहिए। सम्पत्ति को बटोरने के स्थान पर बाँटने का प्रयास करना चाहिए। यदि बटोरते ही चलोगे और बाँटोगे नहीं तो समाज का संतुलन बिगड़ जायेगा। साथ ही व्यक्ति सम्पूर्ण जीवन की शक्ति को विविध सामग्री को जुटाने में ही व्यय कर देता है। इन वस्तुओं का अधिक संग्रह करने पर उनके रख-रखाव की भी चिंता रहती है। मन इनके सम्भालने में ही लगा रहता है, वह आत्म-चिंतन और परमात्म - चिंतन से सर्वथा दूर हो जाता है।



न्याय - शास्त्र के प्रणेता कणाद अपरिग्रही थे। फसल काटते समय जो अनाज की वल्लियाँ गिर जाती हैं , वे उन्हें -उन्हें चुन-चुन कर तथा कूट - कूट कर अनाज निकाल लिया करते थे। उसी से अपना भोजन चलाया करते थे तथा अतिथि का सत्कार भी उसी से किया करते थे। शेष समय तत्त्व-चिंतन में व्यतीत किया करते थे , पास में कुछ भी नहीं रखा रखते थे। जिस राजा के राज्य में वे रहते थे , उस राजा को पता चला कि उनके राज्य में इतना बड़ा दार्शनिक रहता है , उसके पास खाने-पीने की वस्तुओं की कमी है , अनाज के कण - कण बीन कर भोजन चलाता है। कण-कण बीन के भोजन का जुगाड़ करने के कारण ही कणाद नाम सामान्य-जन में प्रसिद्द हो गया था। वास्तविक नाम का तो किसी को ज्ञात ही नहीं रहा।



राजा ने सोचा उस ऋषि को सीधा - सामग्री और पर्याप्त धन दे आता हूँ। मंत्रियों को आज्ञा दी कि आज ऋषि कणाद के पास जाना है। चीनी की बोरियां , घी के टीन , चावल और अनाज की बोरियां , कई थैली असर्फियाँ साथ लेकर चलनी है। इतना बड़ा ऋषि मेरे राज्य में रहे और उसे खाने-पीने की कठिनाई हो, यह मेरा अपना अपमान है। सामग्री के साथ राजा साथ चले और ऋषि के आश्रम में पहुंचे। राजा ने घोड़े से उतरकर ऋषि को प्रणाम किया और हाथ जोड़ कर निवेदन किया---"बड़े ही दुःख की बात है कि आप मेरे राज्य में रहें और आपको खाने-पीने का कष्ट हो। में बहुत-सी सामग्री ,बहुत-सी असर्फियाँ आपके लिए लाया हूँ , अब आपको कोई कष्ट नहीं होगा। इन्हें आप स्वीकार कर अनुगृहीत कीजिए। आज्ञा दीजिए कि इन्हें कहाँ रखवाऊं। " ऋषि कणाद ने कहा -- "राजन ! आपने इतना कष्ट क्यों किया ? आप इतना धन तो ले आये हैं , पर इसे सम्भालेगा कौन ? धन के साथ चिंताएं भी तो आती हैं। मैं धन की चिंता करूंगा या आत्म- चिंतन करूंगा । आप इसे उठा कर वापिस ले जायिए। यदि इसे आप नहीं ले जाते तो इतना बता दीजिए कि आप के राज्य की सीमा कहाँ तक है। मैं आपके राज्य की सीमा से पार चला जाऊंगा। "


कहने का तात्पर्य यह है कि व्यक्ति को अपरिग्रही बनना चाहिए। इससे से ही परम-तत्त्व का ज्ञान हो सकता है। इन पाँचों यमों के अनुष्ठान से ही आंतरिक शक्ति का रूपांतरण होता है। मानव में प्रेम , करुणा आदि सद्गुणों का विकास होता है। जाति, देश , काल और निमित्त से अविच्छिन्न अर्थात रहित यम का सार्वभौम पालन महाव्रत होता है। सार्वभौम से तात्पर्य है--- मनुष्य और मनुष्येतर समस्त प्राणी , हिन्दू, मुसलमान आदि भेदों से किसी के साथ भी यमों के पालन में भेद न करना ' जातिगत सार्वभौम महाव्रत' है। भिन्न-भिन्न खण्डों , देशों , प्रान्तों , ग्रामों , स्थानों एवं तीर्थ-अतीर्थ आदि के भेद से किसी के साथ भी यमों के पालन में भेद न करना ' देशगत सार्वभौम ' महाव्रत है। वर्ष , मास , पक्ष , सप्ताह , दिवस , मुहूर्त , नक्षत्र एवं पर्व-अपर्व आदि के भेदों से यम के पालन में किसी भी प्रकार भी भेद न करना ' कालगत सार्वभौम ' महाव्रत कहलाता है। यज्ञ , देव-पूजन , श्राद्ध , दान , विवाह , न्यायालय , क्रय-विक्रय , आजीविका आदि के भेदों से यम के पालन में किसी प्रकार का भेद न रखना ' निमित्त(समय) गत सार्वभौम ' महाव्रत है। निष्कर्षत : यह है कि किसी देश अथवा काल में , किसी जीव के साथ , किसी भी निमित्त से , हिंसा , असत्य , चोरी , व्यभिचार आदि का आचरण न करना तथा परिग्रह आदि न रखना ' सार्वभौम यम महाव्रत ' ही है।**********************************************



मंगलवार, 29 अक्टूबर 2013

शुद्ध अन्न से ही मन की शुद्धि

आंतरिक पवित्रता का सम्बन्ध मन , बुद्धि और आत्मा से 



पवित्रता (शौच ) , संतोष , तप , स्वाध्याय और ईश्वर - प्रणिधान ये पांच नियम हैं। नियम परमात्मा से मिलने के लिए सेतु का काम करते हैं। ये साधन , द्वार और अनुशासन हैं। अंतिम उद्देश्य परमात्मा की प्राप्ति के लिए ये नियम हैं। ये इन्द्रियों को दमित करने के लिए और जीवन को विकसित करने के लिए नियम हैं। मन का परिष्कार करने एवं परम तत्त्व से मिलने में ये नियम सहायता प्रदान करते हैं।


 पवित्रता दो प्रकार की होती है-- बाहरी और भीतरी। जल -मिट्टी से शरीर की , स्वार्थ-त्याग से व्यवहार और आचरण की तथा न्याय से उपार्जित सात्विक पदाथों के पवित्रता पूर्वक सेवन से आहार की इसे बाहरी पवित्रता कहा जाता है। अहंकार-भाव , ममता , राग , द्वेष , ईर्ष्या,भय और काम -क्रोध आदि भीतरी दुर्गुणों के त्याग से आंतरिक पवित्रता होती है। ' शुच शौचे ' अर्थात पवित्रता के आने पर परमात्मा तभी मन- मन्दिर में प्रवेश करते हैं। बाहर की पवित्रता से सम्बन्ध शरीर , वस्त्र , अन्न , धन तथा पवित्र आचरण से है। जबकि है।आंतरिक पवित्रता का सम्बन्ध मन , बुद्धि और आत्मा से __ विशेष रूप से आंतरिक पवित्रता मन की करनी है।


शरीर की शुद्धि जल से स्नान करने से होती है। मन की शुद्धि सत्य पूर्ण आचरण से , ब्रह्म-विद्या तथा तप से जीवात्मा की शुद्धि और शास्त्र - ज्ञान से बुद्धि की शुद्धि होती है। परमात्म-तत्त्व के लिए बुद्धि की निर्मलता आवश्यक है।

 धन की शुद्धि दो प्रकार से होती है -- ईमानदारी से परिश्रम पूर्वक जो धन कमाया जाये , वह शुद्ध होता है। साथ ही कमाए हुवे धन से पांचवां हिस्सा दान कर दिया जाये तो उसकी शुद्धि होती है। सभी प्रकार की पवित्रताओं में धन की पवित्रता ही मुख्य समझी जाती है। जिसका धन पवित्र है , वास्तव में वही व्यक्ति पवित्र है। मिट्टी से हाथ माँज लेने से या जल से स्नान कर लेने से कोई व्यक्ति पवित्र नहीं हो सकता। अपवित्र धन से ख़रीदे हुवे अन्न से जो भोजन करता है , वह कभी भी शुद्ध नहीं हो सकता। मन को शुद्ध करने के लिए शुद्ध आहार की आवश्यकता है , क्योंकि शुद्ध अन्न से ही मन की शुद्धि होती है -- " अन्न्मयं सौम्य मन: " अर्थात अन्न मनोमय है , क्योंकि अन्न के सूक्ष्म भाग से मन का निर्माण होता है।

आचरण भी शुद्ध होना चाहिए। आचरण की शुद्धि महापुरुषों के आचरण के अनुसरण से होती है। क्योंकि महापुरुष जो करते हैं , वह धर्म बन जाता है। वेद जिसे करने को कहता है , वही करना चाहिए। यदि कोई आचरण लोक- मर्यादा के विरुद्ध है तो उसे भी नहीं करना चाहिए। कोई भी आचरण कितना भी पवित्र क्यों न हो , यदि वह लोक- मर्यादा के विपरीत है तो उसे नहीं करना चाहिए। इस प्रकार शरीर,पदार्थ , भोजन , आचरण आदि की शुद्धि बाह्य शुद्धि है। राग , द्वेष , काम , क्रोध , लोभ , मद- मत्सर आदि से मन को खाली करना यह आंतरिक मन की शुद्धि है। आत्म- साक्षात्कार के लिए मन- मंदिर में परमात्मा को स्थापित करने के लिए दोनों शुद्धियाँ होनी चाहिएं और यही शौच का अभिप्राय है।***********************************


संतुष्ट एवं प्रसन्न- चित्त रहने का नाम संतोष

संतोष आत्मा को पहचानने का सफल प्रयास 



मन में संतोष भी होना चाहिए। संतोष-वृत्ति का उदय हो जाये तो उत्तम सुख का लाभ होता है। मन की शुद्धि संतोष से ही होती है। सुख- दुःख , लाभ- हानि , यश- अपयश , सिद्धि - असिद्धि , अनुकूलता - प्रतिकूलता आदि के प्राप्त होने पर सदा- सर्वदा संतुष्ट एवं प्रसन्न- चित्त रहने का नाम संतोष ही है। अपरिग्रह का भाव अपनाकर भौतिक पदार्थों के पीछे नहीं दौड़ना चाहिए। यह अंधी दौड़ है , इसका कोई अंत नहीं है। ये सब साधन - मात्र हैं , साध्य तो कोई अन्य है। उसी की प्राप्ति का ही प्रयास करना चाहिए। 

संतोष का यह भी अर्थ नहीं है कि हाथ पर हाथ धर कर बैठें रहें। आप अपने को भाग्य के भरोसे न छोडिये। भाग्य बड़ा कि पुरुषार्थ यह एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। यदि इन दोनों की तुलना की जाये तो इसका समाधान सहज नहीं है। पूर्व जन्म के संचित कर्म ने सिर उठाया , उसे फल देने का अवसर मिला। उससे आपको जी सुख - दुःख , मान-सम्मान ,अपमान, जो भी प्राप्त हुवा , वह आपका प्रारब्ध है। यानि आपके संचित कर्म ने फल देना प्रारम्भ किया है। इसी को भाग्य कहते हैं। तथा वर्तमान क्षणों में उत्साह लेकर आप जी कर्म करते हैं , आपका जो अभीष्ट है , उसे पाने के लिए तीव्रतम प्रयत्न ही पुरुषार्थ है। पुरुषार्थ करते हुवे मन में संतोष बनाये रखना चाहिए। अपरिग्रही बन जीवन में इन भौतिक वस्तुओं के प्रति अधिक रागात्मकता नहीं रखनी चाहिए।

जो कुछ मिल रहा है, जो भी हो रहा है , प्रभु कृपा से हो रहा है। आगे जो होगा , वह भी प्रभु कृपा से ही होगा ; ऐसा मानकर कर्म करते रहना चाहिए, इसे ही संतोष कहा जाता है। संतोष आत्मा को पहचानने का सफल प्रयास सिद्ध हो सकता है।

 संतोष ही सबकुछ है। संतोषी व्यक्ति को ईश्वर , निर्वाण , परम - आनंद आदि सब कुछ मिल जाता है। जो कुछ उपस्थित है उसे ठीक से जानो , परमात्मा ने जो दिया है उसके प्रति कृतज्ञता प्रकट करो। प्रभु का धन्यवाद देते हुवे कहो -- ' प्रभो! आपने मुझे अवसर दिया है , जीने का, खाने- पीने का , सुनने और देखने का । इसके लिए हम आभार प्रकट करते हैं।

 ' आत्म - निरीक्षण का यह विलक्षण दृष्टिकोण है , असंतोष इसका विरोधी है। उससे चिंता और तनाव होता है। आकांक्षाएं सताती हैं , पर संतोष से व्यक्ति भार- रहित हो अपने को हल्का अनुभव करता है। संतोष से बड़ा जीवन - काल में अन्य कोई सुख नहीं है।&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&



सोमवार, 28 अक्टूबर 2013

परमात्मा का ज्ञान ही तप

तप से मन की कालिमा दूर होती है 


तप से मन की कालिमा दूर होती है--- ' तपसां कल्मषं हन्ति '। स्वयं ईश्वर कहते हैं -- ' तपो में हृदयं साक्षात् ' तप तो साक्षात् मेरा ह्रदय है। मन और इन्द्रियों के संयम रूप धर्म-पालन करने के लिए कष्ट सहने का और तितिक्षा एवं व्रत आदि का नाम तप है। 


पतंजलि ने संतोष के बाद तप का नाम लिया, संतोष आने से पहले भी तप कर सकते थे । पर यदि बिना संतोष के तप करेंगे तो वह शांतिदायक n होकर , तपने वाला होगा। यदि कामना-पूर्ति के लिए तप किया जाता है , तो वह तप तपाने वाला होगा। तपस्वी को मृत्यु के सिर पर पाँव रख कर परमात्मा का दर्शन करना है। उसके मन में किसी प्रकार का भी भय नहीं होना चाहिए। 

तप का अर्थ है -- सहजता और सहज जीवन का अभ्यास। जितना सहज जीवन होता है , उतना ही ज्यादा आनंद होता है। इसके लिए अधिक वस्तुएं नहीं जुटानी पड़तीं। यदि आप परम सुखी और आनंदित रहना चाहते हैं, तो अपने को तपाइये। तप का अर्थ है जीवन में सहन -शीलता। तपने से ही जीवन में चमक आती है। अपमान को सह लेना , कडवी बात को बर्दाश्त करना , ये सब तप के अंग हैं। तथा ये सभी परमात्मा से मिलने में सहायक होते हैं।

अत: साधना करते समय जो भी कष्ट आते हैं , उन्हें धैर्य पूर्वक सहन करना ही तप है। गर्मी- सर्दी , भूख-प्यास आदि द्वन्द्वों को सहन करने की सामर्थ्य को बढाना ही तप है। जैसे स्वर्ण बिना आग में तपाये शुद्ध नहीं होता और उसी प्रकार यह दुर्गंधी - पूर्ण शरीर भी बिना तप के शुद्ध नहीं होता। तपस्या के द्वारा शरीर के सभी विकार जल जाते हैं। तप - रूपी अग्नि में से निकलने से यह कुंदन बन जाता है। तप से इन्द्रियों की वासना -रूपी मैल जल जाती है। मन की वृत्ति निर्मल हो जाती है। भूख- प्यास सहने से , मौन धारण करने से इन्द्रियों की चंचलता दूर हो जाती है। इसके विपरीत चलने से पतन तो निश्चित ही है। तप को उल्टा करने से पत अर्थात पतन ही होता है। परिणामत: जीवन में गिरावट आ जाती है।

गीता के अनुसार तप के तीन प्रकार हैं--- शारीरिक , वाचिक तथा मानसिक। प्रथम शारीरिक तप है । देवता, ब्राह्मण , गुरु , ज्ञानी- संतों का सम्मान , पूजन तथा उचित रीति से सेवा आदि करना ही शारीरिक तप है। वाचिक तप के अंतर्गत वाणी का तप आता है। निंदा एवं चुगली से रहित वाणी का प्रयोग करना तथा उद्वेग का भाव न आना ही वाचिक तप कहा जाता है। वचन सत्य के साथ प्रिय तथा हितकर भी होना चाहिए। प्रिय से तात्पर्य वह वचन कटुता , रूखापन ,ताना तथा अपमान आदि के भाव से रहित होकर ; मीठा, सरल और शांत होना चाहिए। हित-वचन वही है , जिसके परिणाम सब का हित होता है।

 जिसमें हिंसा , द्वेष , ईर्ष्या तथा वैर -विरोध की भावना न हो और वह प्रेम, दया , करुणा व मंगल से परिपूर्ण हो। ऐसा अनुद्वेग कर सत्य प्रिय तथा हितकर वाक्य बोलना वाणी का तप है। विषाद , चिंता, भय, शोक, मोह , व्याकुलता आदि दोषों को त्याग कर मन का शुद्ध होना तथा प्रसन्नता और हर्ष आदि से युक्त होना मानसिक तप है। इसमें मन शांत सरल और शीतल बना रहता है।

 ये सभी गुण मन के दोषों को दूर करके मन को निर्मल बनाते हैं। पुन: सात्विक , राजस और तामस भेद से तप तीन प्रकार का होता है। सात्विक तप के मूल में कोई कामना नहीं होती तथा श्रद्धा का भाव निहित होता है। जो तप अपने मान , बडाई आदि को लेकर किया जाता है , वह राजस तप कहलाता है। जो दंभ या अहंकार को लेकर अज्ञान युक्त मन से किया जाता है उसे तामस तप कहा जाता है। इसमें लोग काँटों की शय्या पर सोकर , वृक्षों पर उल्टा लटक कर , एक पैर पर खड़ा आदि होकर अनेक प्रकार की क्रिया करते हैं। यह अज्ञानवश तामस तप ही है।

हमारे ध्यान का विषय होने वाले दो पदार्थ हैं --- तपस्वी और तप। तपस्वी तो आँखों से देखा जा सकता है , पर तप अमूर्त और व्यापक तत्त्व है। परमात्मा का ज्ञान ही तप है। तपस्वी को परम तत्त्व का अन्वेषी ही होना चाहिए और यही सच्चा तप है।&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&& 



ओंकार महात्म्य

 शिव को ही प्रणव और प्रणव को ही शिव 
ओंकार महात्म्य का वर्णन भारतीय सनातन ग्रंथों पदे- पदे अर्थात स्थान- स्थान पर हुवा है। मनुस्मृति से लेकर गो- पथ ब्राह्मण , उपनिषदों में -- कठ से लेकर अमृतनाद , अथर्व शिरा । अथर्वशिरपा , मैत्रायणी , मैत्रेय , ध्यान -बिंदु आदि कितने ही प्रधान एवं अप्रधान ग्रंथों में इसका उल्लेख हुवा है।

 ' श्रीमदभगवदगीता 'में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं -- ' गिरारम्भेम्येकं अक्षरम ' अर्थात वाणी के प्रारंभ में एक अक्षर मैं ही हूँ। यजुर्वेद में ' ॐ खं ब्रह्म ' , शिव पुराण में -- ' शिवो वो प्रणवो ह्येष प्रणवो वा शिव: स्मृत: ' द्वारा शिव को ही प्रणव और प्रणव को ही शिव कहा गया है। अन्यत्र ' ॐ इति सर्वं ' द्वारा सम्पूर्ण जगत को ही ओममय अर्थात ईश्वरमय बताया गया है।

 इस प्रकार ॐ के इस अक्षर में ही चराचर जगत और उसकी सम्पूर्ण शक्तियां अभिव्यक्त हो रही हैं। ॐ परमात्मा का ही प्रकाश और उसी का व्यक्त रूप है। इस प्रकाश - प्रेरणा को हम जितने अंशों में लोगों तक पहुंचाते हैं , समझना चाहिए उतने ही अनुपात में ॐ के तत्त्व - दर्शन को आत्मसात किया तथा आचरण में उतारा गया। हम अपनी आत्मीयता को सीमा- बद्ध न रखें , उसे व्यापक और विस्तृत बनाएं -- ॐ का अकार इसी बात की प्रेरणा देता है। 

उकार उससे आगे की गति- प्रगति का द्योतक है। जब यह विकसित होते हुवे विराट ब्रह्म में दूध -पानी की तरह घुल-मिल जाता है , तब यही मकार बन जाता है। जीवन- मुक्ति , एकत्व , अद्वैत इसे ही कहते हैं। इस प्रकार अकार से यात्रा प्रारंभ कर मनुष्य अपने को परिष्कृत और विकसित करते हुवे चलता है, तो अंतिम परिणति मकार के रूप अर्थात ईश्वर - उपलब्धि के रूप में सामने आती है।

 यह प्रणव की सबसे बड़ी विशेषता है। यह प्रवृत्ति मार्ग में चलाते हुवे भी अंतत: आदमी को अंतिम लक्ष्य पर ला खड़ा कर देती है । ऐसी विशिष्टता अन्य किसी शब्द में नहीं है। हम ॐ की उपासना और जप तो करते हैं पर उसमें सन्निहित मर्म और आदर्श की अवहेलना कर देते हैं। आज की दुर्गति का यही प्रमुख कारण है। ॐ के सच्चे मर्म और आदर्श को पहचानकर एवं अपनाकर ॐ के सच्चे उपासक कहला सकते हैं ।^^^^^^^^^^^^^^^^^^^^


इस क्षण होश में हैं तो वह वर्तमान का मालिक

प्रगति का यथार्थ माप- दंड समता है ,संवेदना नहीं 




 मुख्य बात है धर्म धारण करना । धर्म धारण करने के लिए अभ्यास करना होता है। प्रयास करना होता है।विधि को जानने के लिए भीतर की सच्चाई को जानना है। जान कर समता में स्थित रहना है। प्रगति का यथार्थ माप- दंड समता है ,संवेदना नहीं । संवेदना के प्रकट होने पर यदि समता खो दी , फिर राग पैदा करना शुरू कर दिया , द्वेष पैदा करना शुरू कर दिया , तो प्रगति नहीं हो रही। राग और द्वेष का संग्रह अत्यधिक है। जब-जब यह संग्रह उभर कर आये , तब-तब अपनी ओर से संवर कर लें , रोक लगा दें ,यानि उभार की वजह से नया संस्कार न बनने दें। उस पर रोक लगा दें। यही संवर है। 



संवर-क्रिया पर रोक लगाने पर , यह निर्जरा होनी शुर हो जाएगी । सारे संवरों में सबसे अच्छा मन का संवर है। ओर वह भी सम्पूर्ण मानस का संवर , अंतर्मन की गहराइयों तक का संवर। ज्यों - ज्यों समता में रहने का अभ्यास बढ़ेगा ; चेतन -अर्धचेतन -अचेतन की दीवार टूटनी शुरू हो जाएगी। प्रकृति के इस नियम को अनुभूतियों से समझेंगे ,तो स्वत: कल्याण प्रारंभ हो जायेगा।


 जब अनुभूतियों के स्तर पर समझ में आने लगेगा , तब गहरा संवर होने लगता है। दुःख-विमुक्ति का रास्ता खुलने लगता है। संवर-क्रिया पर रोक लगाने पर , यह निर्जरा होनी शुर हो जाएगी । सारे संवरों में सबसे अच्छा मन का संवर है। ओर वह भी सम्पूर्ण मानस का संवर , अंतर्मन की गहराइयों तक का संवर। ज्यों - ज्यों समता में रहने का अभ्यास बढ़ेगा ; चेतन -अर्धचेतन -अचेतन की दीवार टूटनी शुरू हो जाएगी। प्रकृति के इस नियम को अनुभूतियों से समझेंगे ,तो स्वत: कल्याण प्रारंभ हो जायेगा।


 जब अनुभूतियों के स्तर पर समझ में आने लगेगा , तब गहरा संवर होने लगता है। दुःख-विमुक्ति का रास्ता खुलने लगता है। जिस कर्म -संस्कार का बीज डाला , उसका फल आया और वह समाप्त हुवा ,लेकिन नया बीज फिर पड़ा , फिर फल आया ; इस प्रकार क्रम चलता रहता है। अंत होता ही नहीं। लेकिन उत्पन्न होकर सर्वथा क्षय हो जाये तो कल्याण हो जाये। हर व्यक्ति , जिसने-जिसने भी सही माने में संवर करना शुरू कर दिया उसी की कर्म - निर्जरा शुरू हो जाएगी। जितना भी कर्म - संग्रह क्यों न हो , यदि नया संग्रह बंद कर दें तो पुरानों को समाप्त होने में कम समय लगेगा ,पर वे धीरे-धीरे क्षय होंगे ही।


नया संस्कार एक आहार है, पुराने संस्कारों का फल दूसरा आहार है। इन दोनों में से कोई-न-कोई आहार मिलता है तो यह चित्त धारा आगे बढती है। चित्त-धारा का शरीर की संवेदनाओं से गहन सम्बन्ध है। अत:चित्त -माईंड -पदार्थ - मैटर-में और पदार्थ चित्त में परिवर्तित हो जाता है। उदाहरणत: हर क्रोध का संस्कार अग्नि -तत्व ही प्रकट करता है ,अत: अग्नि-धातु ही जागेगी। देखते जायेंगे और प्रतिक्रिया नहीं करेंगे , तो ये संग्रहीत संस्कार स्वत: क्षीण होते चले जायेंगे ,इसका प्रमुख कारण समता ही है।

 जो समता में रहता है , उसका उत्तम मंगल सधने लगता है। हर आदमी अपना मालिक स्वयम है। वह अपनी गति स्वयम ही बनता है। लेकिन यदि इस क्षण होश में हैं तो वह वर्तमान का मालिक बन गया। सारी साधना इसी बात के लिए है कि इस क्षण होश है कि नहीं। बौद्धिक स्तर पर समझ कर व्यवहार में उतरना है, अभ्यास में उतरना है। धारण करना है, धर्म धारण करते हैं तो सुख ही मिलता है। परिणामत: सफलता अवश्य ही मिलती है।"भोगत-भोगत भोगते , बंधन बंधते जाएँ । देखत-देखत देखते , बंधन खुल ते जाएँ । । इति =



अभ्यास एवं है निरन्तरता

अभ्यास एवं है निरन्तरता आवश्यक 




एकाग्रता का अर्थ है की मन मात्र एक वस्तु का ही ध्यान करे । इस में केवल लक्ष्य ही दिखाई दे । यदि मन में अन्य कोई प्रवेश कर गया तो आप स्वयं नहीं रह पाएंगे । ध्यान करते समय बोधपूर्ण दशा बनी रहनी चाहिए । 

आप जैसे -जैसे ध्यान करते जायेंगे वैसे -वैसे मन के विकार दूर होते जायेंगे। काम,क्रोध लोभ ,मोह ,अहंकार ,ईर्ष्या .द्वेष ,घृणा आदि जन्मजात विकार हैं । प्राय: ध्यान के नाम पर बैठे तो रहते हैं ,पर मन एकाग्र नहीं रह पाता । मन की एकाग्रता के लिए श्वांस पर ध्यान लगाना चाहिए।

 श्वांस पर ध्यान लगाने से मन धीरे-धीरे वश में होने लगता है , श्वांस की गति यथाभूत होनी चाहिए । जैसा श्वांस आ रहा है ,वैसा ही आने दे ;उसमें कोई परिवर्तन न करें । यही श्वांस की यथाभूत स्थिति है। श्वांस की स्थिति यथाकृत ,यथाकल्पित ,यथेछित अथवा यथा-संकल्पित नहीं होनी चाहिए। श्वांस की यथाभूत स्थिति ही एकाग्रता का आधार बन सकती है।

 एकाग्रता चित्त में स्थिरता उत्पन्न करती है। इस एकाग्रता के माध्यम से मन निर्विकार ही नहीं , अपितु निर्मल होने लगता है। चित्त की निर्मलता ही प्रमुख ध्येय होना चाहिए। मन शांत होने लगता है। मन के शांत होने से इन्द्रियां स्वयं शांत हो जाएँगी। साथ में बुद्धि में भी परिवर्तन होना प्रारंभ हो जायेगा। अत: एकाग्रता के द्वारा मन, चित्त,बुद्धि आदि सभी सम्यक स्थिति में पहुंच जायेंगे। अभ्यास एवं हैनिरन्तरता आवश्यक  ।******