रविवार, 15 सितंबर 2013

दमित क्रोध के लिए सारे रास्ते बंद

 दमित क्रोध के लिए सारे रास्ते बंद 


मनोरोग के जितने भी रोगी हैं , उन्होंने अपने क्रोध का भय अथवा प्रलोभन के कारण दमन किया है । क्रोध दो प्रकार का है _ प्रकट क्रोध व दमित क्रोध । प्रकट क्रोध के लिए सारे रास्ते खुले रहते हैं , परन्तु दमित क्रोध के लिए सारे रास्ते बंद रहते हैं । क्योंकि उसे हम दूसरों को अवगत नहीं होने देते और भीतर ही भीतर वह दमित शक्ति पर प्रहार करती रहती है तथा हमारी स्नायविक शक्ति को क्षीण करती जाती है ; अत: आंतरिक अवयवों पर उसका प्रभाव पड़ता ही है ।

जो ग्रन्थियां अपने नियमित स्राव से शरीर की सारी शक्तियों को नियमित रूप से चलाती हैं , वे स्वयं असंतुलित हो जाती हैं । एड्रिनल ग्रन्थि जो ह्रदय की धड़कन को , नाड़ियों में रक्त के प्रवाह को तथा अमाशय में पाचन को नियंत्रित करती है ; वह क्रोध के वेग से असंतुलित होकर तीव्र गति से कार्य करने लगती है । तब ह्रदय की गति का असामान्य रूप से बढ़ना , नाड़ियों में रक्त का दबाव अधिक हो जाना तथा विशेष रूप से मस्तिष्क की शिराओं एवं धमनियों में तीव्र गति से रक्त का प्रवाह का होना । इसके कारण किसी की शिरा या धमनी फट जाने से तत्काल मृत्यु भी हो जाती है ।


पेट में होने वाले अल्सर का कारण भी दबा हुवा क्रोध ही है । क्रोध के कारण अमाशय की पाचन ग्रन्थियां तीव्र उत्तेजना में आकर अत्यधिक अम्ल रस का स्राव करती हैं , जिससे अमाशय की दीवारों पर जमी पालिश उतर जाती है तथा घाव हो जाता है । इस प्रकार क्रोधी व्यक्ति सदैव व्याधियों से पीड़ित रहता है । प्रसिद्ध शरीर विज्ञानी डा जे.एस्टर ने क्रोध के कारण भस्म होने वाली शारीरिक शक्ति का अनुमान लगते हुवे यह घोषित किया है कि पन्द्रह मिनट के क्रोध करने से मानव की साढ़े नौ घंटे के बराबर शक्ति का ह्रास होता है । इस दुष्परिणाम पर विचार किया जाये पता चलता है की इसी क्रोध ने मानव के कितने आत्मिक गुणों का घात किया है ।

क्षण भर के क्रोध करने मात्र से एक हजार छ सौ रक्त के कण जल जाते हैं । जबकि समता भाव से एक क्षण में मात्र एक हजार चार सौ कण ही बन पाते हैं । इससे भी अंदाज लगाया जा सकता है कि क्रोध कितना दुखदायी व नुकसान दायक सिद्ध होता है ।***************


क्रोधाग्नि द्वारा हमारा विवेक जलकर भस्म

क्रोधाग्नि द्वारा हमारा विवेक जलकर पूरी तरह भस्म 



क्रोध का हमारी मानसिक स्थिति पर अत्यधिक बुरा प्रभाव पड़ता है । क्रोध के प्रभाव से नष्ट-बुद्धि होकर हम पागलों जैसी हरकतें करने लगते हैं , क्योंकि क्रोध एक रूप से पागलपन ही है । इस पागलपन से हमारे मन में सिर्फ एक विचार ही रह जाता है और सब विचार गायब हो जाते हैं । एक ही धुन लग जाती है और सारी शक्ति एक केंद्र -बिंदु पर ही केन्द्रित हो जाती है । इससे एक विशेष बात यह पैदा हो जाती है कि क्रोध में पागल होकर व्यक्ति ऐसे भारी काम भी कर गुजरता है , जो वह सामान्य स्थिति में कभी नहीं कर सकता था । दुःख की बात यह है कि क्रोधी व्यक्ति उस अद्भुत बल का सदुपयोग नहीं कर पाता ; क्योंकि क्रोध की अवस्था में उससे अच्छा काम हो ही नहीं सकता । क्रोधाग्नि द्वारा हमारा विवेक जलकर पूरी तरह भस्म का रूप धारण कर लेता है ।

क्रोध में हमारे पाचन -संस्थान के अंग ठीक से काम नहीं करते । हमारी भूख पूर्ण रूप से मर जाती है । इसलिए क्रोधावस्था में बिलकुल भूख नहीं लगती । क्रोधावस्था में हमारी ग्रन्थियां डिफेन्स की जगह ओफेंस का कार्य करने लगती हैं अर्थात सुरक्षा की जगह आक्रामक गतिविधियों के लिए काम करना प्रारम्भ करने लगती है । क्रोध एक तामसी वृत्ति है । रक्त में तामसी वृत्ति का विषैला प्रभाव उत्पन्न होना प्रारम्भ हो जाता है । क्रोध की अवस्था में दिल की धड़कन बढ़ जाती है और दिमाग गरम हो जाता है। इसलिए क्रोध करने वाले को ठंडा पानी पिलाते हैं और इससे उसे शांति का अनुभव होता है।



क्रोधाग्नि इस शरीर को ऐसे जलती है जैसे ग्रीष्म ऋतु की कड़ी धूप से हरियाली सूखने लगती है । उसके शरीर की धातुएं क्षीण होने लगती हैं । तब वह धैर्यहीन और ओछे स्वभाव का व्यक्ति हो जाता है । अधिक क्रोध करने से तथा शरीर में बार-बार ऊष्णता आने से पित्त कुपित होने लगता है एवं इससे पित्त-जनित अनेक व्याधियां उत्पन्न होने लगती हैं । अस्तु , क्रोध का अंत पश्चाताप में होता है , यानि क्रोध की अवस्था में व्यक्ति वैसा कार्य कर जाता है , जो उसने सपने में भी नहीं सोचा । लेकिन क्रोध शांत होने पर उसका जो विवेक तिरोहित हो गया था तो वह वापिस लौटता है । तब उसकी नींद खुलती है और वह जागृत हो जाता है । साथ ही उसे क्रोध करने पर पश्चाताप होता है । इससे सिद्ध होता है कि क्रोध नहीं करना चाहिए । ******************

' टीन एज ' संक्रमण की मध्य अवस्था

 ' टीन एज ' संक्रमण की मध्य अवस्था 




मानव-जीवन को सामान्यतया चार आश्रमों में विभाजित किया गया है । इनको ब्रह्मचर्य , गृहस्थ , वानप्रस्थ और संन्यास के नाम से जाना जाता है । ब्रह्मचर्य आश्रम विद्याध्ययन का कार्य-काल होता है । इसमें बालक समुचित शिक्षा को ग्रहण करता है तथा जीवन का निर्माण करता है । जीवन की आधारशिला को निर्मित करता है । यह आश्रम धर्म का मूल आधार है । यह किशोरावस्था का काल होता है । इसमें भटकने के अत्यधिक आसार होते हैं। किशोरावस्था को ' टीन एज ' भी कहा गया है ; क्योंकि अंग्रेजी में गिनती के अंतर्गत थर्टीन से नाइनटीन में ' टीन ' शब्द का प्रयोग होता है । यह ' टीन एज ' संक्रमण की मध्य अवस्था होती है । इसमें बालक न ही पूर्ण रूप से बालक ही रह पाता है और न हो वह पूर्ण रूप से युवक ही हो पाता है । न ही बालक के समान व्यवहार कर सकता है और न पूर्ण युवक के समान ही ।

ब्रह्मचर्य-काल जीवन-निर्माण का काल होता है । इस अवस्था में जो कुछ प्राप्त कर लिया जाता है , वही पूरे जीवन का आधारभूत होता है । विद्या अध्ययन ही इस समय का मूल रूप है । विद्यार्थी को कठोर परिश्रम करना चाहिए। कहा भी गया है कि _ ' विद्यार्थिनाम कुतो सुखं सुखार्थिनाम कुतो विद्या ' अर्थात विद्यार्थी के लिए सुख नहीं है और सुखार्थी के लिए विद्या नहीं है । बाल्यावस्था में बालक पर विशेष ध्यान देना चाहिए और उसका प्रेम एवं स्नेह पूर्वक पालन करना चाहिए । ' टीनएज ' अर्थात किशोरावस्था में उस पर नियंत्रण रखना चाहिए । क्योंकि यही उम्र बनने और बिगड़ने की होती है । ढ़ील देने पर बालक पतन की ओर ही बढ़ जाता है । इसलिए उसके उत्थान के लिए नियंत्रण की अत्यधिक आवश्यकता है । एक रूप से इस काल या आश्रम को धर्म या आचरण का काल कह सकते हैं ।

दूसरा गृहस्थ आश्रम है , जो विशेष विशेष कर्म और अर्थ का संयोग है । कर्म का व्यापक रूप काम में समाहित हो जाता है । काम ही काम्य है यही समस्त कामनाओं का जनक है । कामना का भाव कर्म पर ही आधारित होता है। यह आश्रम पूर्णत: अर्थ पर ही आधारित है । इसमें अनर्थ का कोई महत्त्व नहीं है । अर्थ अर्थात धन से ही समस्त कार्य एवं मनोरथ पूर्ण होते हैं । धन ही समस्त मनोरथ के साथ-साथ सब प्रकार के धार्मिक अनुष्ठान एवं पुण्य एवं दान में सहायक होता है । गृहस्थ ही समस्त आश्रमों का पालन-पोषण करता है । गृहस्थ द्वारा ही ब्रह्मचारी , वानप्रस्थी एवं संन्यासी का पालन-पोषण होता है । इसीलिए गृहस्थ को सभी आश्रमों में श्रेष्ठ आश्रम कहा गया है । और इसे ही ज्येष्ठ आश्रम की संज्ञा से प्रतिष्ठित किया गया है ।



गृहस्थ आश्रम में व्यक्ति अपने उत्तरदायित्वों को पूर्ण करने के लिए प्रतिबद्ध होता है । वह विवाह करके एक नई सृष्टि का जहाँ निर्माण करता है तथा वहां वह पूर्ण निष्ठा के साथ उनका पालन-पोषण भी करता है । अपने कर्त्तव्य के प्रति वह अधिक सजग होता है और वह अपने कर्त्तव्य को पूर्ण करने का भरसक प्रयास भी करता है । विवाह का अर्थ विशेष रूप से वहन करना ही होता है ।


तृतीय आश्रम वानप्रस्थ है । इसमें व्यक्ति अपने गृहस्थ - धर्म को निभाने के बाद जीवन को एक नई दिशा की ओर अभिमुख कर देता है । वह अपनी पारिवारिक जिम्मेदारी से मुक्त हो जाता है और वह सामाजिकता की ओर अग्रसर हो जाता है । व्यक्ति का क्षेत्र इस आश्रम में आकर अत्यधिक विस्तृत हो जाता है । वह परिवार के स्थान पर समाज की बढ़ जाता है । इसमें व्यष्टि के भाव के स्थान पर समष्टि का भाव अंकुरित हो उठता है । कामासक्ति का विस्तार होकर जन-कल्याण में हो जाता है । लोक-कल्याण का भाव अहम हो जाता है । एक रूप से वह घर में रहते हुवे भी घर से अनासक्त होने लगता है । उसका जीवन घर में अनासक्त भाव से एकांत वन के समान विराग , विमोह एवं विद्वेष भाव से आपूरित हो उठता है । उसमें कर्त्ता - भाव का अहं तिरोहित होने लगता है और उसमें द्रष्टा-भाव जन्म लेने लगता है । यह द्रष्टा -भाव ही उसे संतुष्टि प्रदान करता ही है । तथा जीवन का एक न्य द्वार खोलता है ।

जीवन का चतुर्थ एवं अंतिम आश्रम संन्यास है । इस आश्रम में व्यक्ति स्वयं को उस प्रभु के सम अपने को प्रतिष्ठित करने का प्रयास करने लगता है । वह इसमें नये जन्म और जीवन की तैयारी में संलग्न होने लगता है । इस में सभी प्रकार की सांसारिक कामनाओं से इतिश्री कर प्रभु -ध्यान में ही मन लगाना चाहिए । जीवन का यह उत्कर्ष काल है । इसमें अभिन्न रूप में अपने आराध्य का ही चिन्तन , मनन और ध्यान करना चाहिए , ताकि परम शांति प्राप्त हो सके और सच्चिदानन्द की भी प्राप्ति हो सके । यही जीवन की सतत गति शील प्रक्रिया है ।******************


कुंवा खोदने वाला उत्तरोत्तर नीचे जायेगा

कुंवा खोदने वाला उत्तरोत्तर नीचे जायेगा  और दीवार चिनने वाला क्रमश: ऊंचा उठता चला जायेगा' 

' तमसो मा ज्योतिर्गमय ' यह बहुत बड़ी उक्ति है । इसे जीवन के स्रोत वाक्य के रूप में प्रस्तुत किया जाता है । प्रकाश की ओर बढ़ने की चाह ही जीवन का सही उद्देश्य हो सकती है । अंधकार की ओर देखना ही अविद्या की ओर बढ़ना है । स्पष्ट है कि धर्म-मार्ग में चलने वाला मनुष्य अपने द्वेष आदि दुर्गुणों को इस प्रकार नष्ट करता है , जैसे सूर्य अंधकार का विनाश कर डालता है । साथ ही जैसे सूर्य अपने प्रकाश से जगमगा रहा है , उसी प्रकार धर्मात्मा की प्रशंसा चारों ओर फैल जाती है । मनुष्य को पतन की ओर ले जाने वाली राजसी और तामसी वृत्तियाँ को अंधकार या अविद्या कहा जा सकता है । जैसे अंधकर में आँख वस्तु के वास्तविक रूप को नहीं ग्रहण नहीं कर पाती , उसी प्रकार जो वृत्तियाँ कर्त्तव्य -बोध में बाधक बनकर कर्त्तव्य से विमुख कर दें , वे अंधकार के समान ही हैं । इस अवस्था में मनुष्य को धर्म का प्रकाश ही सूर्य के समान मार्गदर्शक बनता है ।

जब मनुष्य का पतन होने लगता है तो कैसे एक के बाद दूसरी बुराई आती चली जाती है । वही मनुष्य ऊंचा उठने का व्रत लेले तो एक-एक बुराई दूर होती चली जाती है और उसका स्थान सद्गुण ग्रहण करते चले जाते हैं । किसी नीतिकार ने कहा भी है _ ' मनुष्य अपने ही कर्मों से नीचे गिरता चला जाता है । और पवित्र कर्मों से ऊंचा उठता चला जाता है । जैसे कुंवा खोदने वाला उत्तरोत्तर नीचे जायेगा और दीवार चिनने वाला क्रमश: ऊंचा उठता चला जायेगा । '

अँधेरा यदि प्रकाश की अनुपस्थिति है , तो छाया अँधेरे और प्रकाश के बीच की एक ऐसी स्थिति है जो होकर भी नहीं है और न होकर भी है । अंधकार का अर्थ है एक काला आकार जो अँधेरे का घनघोर समुद्र है । आँख बंद करते ही सब अँधेरा ही अँधेरा है उसका कोई रूप -रंग नहीं होता । लेकिन छाया ऐसी नहीं है । छाया का अर्थ_ प्रकाश तो है , किन्तु उसके मार्ग में कोई बाधा आ गयी है । उस बाधा की पृष्ठ -भूमि में प्रकाश उपस्थित रहता है । उसकी किरणें उस वस्तु को न भेद कर उसके इधर-उधर बिखर गयी हैं । और उस वस्तु का बिम्ब ही छाया है । इस छाया का पहचानना बहुत ही कठिन है । यह तो बताया जा सकता है की यह पेड़ की छाया है या किसी वस्तु की छाया है । पर यह बताना बड़ा कठिन है कि यह किस विशेष वृक्ष या वस्तु की वास्तविक छाया है । जब तक कि उस वस्तु को पहले न देखा हो । छाया विश्राम-स्थल तो हो सकती है , लेकिन वहां स्पष्टता नहीं हो सकती ; क्योंकि वहां प्रकाश नहीं । जहाँ प्रकाश नहीं , वहां स्पष्टता भी नहीं होगी ।

ज्ञान ही समझ को उत्पन्न करता है । अन्यथा अत्यधिक उलझनें और समस्याएं उपस्थित हो जाती हैं । बिना ज्ञान के चलना अंध -मार्ग पर चलना है ।इसीलिए ज्ञान -प्राप्ति को ब्रह्म और मोक्ष का मार्ग व द्वार बताया गया है । प्रकाश के बिना कुछ भी सम्भव नहीं है । प्रकाश का अवरोध ही छाया का निर्माण करता है । लेकिन व्यक्ति की पृष्ठ-भूमि में प्रकाश की उपस्थिति छाया का निर्माण नहीं करती अपितु वह परछाई बनाती है । परछाई में छाया तो है , लेकिन वह 'पर ' अर्थात दूसरे की है । पर यह आश्चर्य की बात है कि छाया तो उसकी है परन्तु उसे परछाई कहा जाता है । भला स्वयं उसकी छाया को दूसरे की छाया कैसे कहा जा सकता है ?


हम जो कुछ भी कर रहे हैं , कह रहे हैं , वह सब दूसरों का ही तो है , सिवाय इस शरीर के । तो बात स्पष्ट है कि इस शरीर से जो कुछ भी हो रहा है , वह अपनी छाया न होके परछाई ही तो है । साथ ही यहाँ जिस ' प्रकाश ' की बात कही गयी है , वह प्रकाश स्व-बोध का प्रकाश है , यह स्व को जानने का है पर स्व को पा लेने का है । और जब व्यक्ति अपनी निजता को पा लेता है , तो उसका समूल परिवर्तन हो जाता है । क्योंकि वह दुनिया के सामने मौलिक व्यक्तित्व के रूप में सामने आता है । इसलिए वह विद्रोही मान लिया जाता है । दूसरों का अन्धानुकरण न कर व्यक्ति को अपने स्वतंत्र और मौलिक अस्तित्व का निर्माण करना चाहिए ।

इसी प्रकार के व्यक्तित्व दूसरों के लिए छाया बनते हैं । छाया कल्याणकारी होती है , पर परछाई किसी भी रूप में कल्याणकारी नहीं होती । प्रकाश बनने का प्रयास करना चाहिए , यदि प्रकाश न बन सकें तो छाया भी बन सकते हैं । लेकिन परछाई नहीं बनना चाहिए , उसमें न तो सुख है और न ही आनन्द । प्रकाश के समस्त अवरोधों को गिराकर हमें प्रकाशमय बन जाना चाहिए : तभी हम प्रकाश-पुंज होकर ज्योतिर्मय हो सकते है ।*******

ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय

ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय 

संत कबीर 





संत कबीर का हमारे समाज में अत्यधिक महत्त्व है । कबीर ने समाज के साथ-साथ जीवन के उच्चतम मूल्यों का स्पर्श किया है । उन्होंने सामाजिक विसंगतियों को अत्यधिक गहराई के साथ प्रस्तुत किया है । उन्होंने कर्म को ही सर्वश्रेष्ठ माना है । ईश्वर के निर्गुण रूप को उन्होंने ज्ञान के आधार पर समाहित किया है । रहस्यवाद के आधार पर कबीर ने एक नये जीवन-दर्शन को प्रस्तुत किया है ।

कबीर जैसा साधारण कुल का व्यक्ति सामान्य शब्दों में विशेष अभिव्यक्ति प्रदान करता है । कबीर सब जगह अपना एक विशिष्ट व्यक्तित्व रखते हैं । पढ़े - लिखे न होकर भी वे गहन ज्ञान की प्रस्तुति करते हैं । कलम कागज को न छू कर भी वे सदैव परम विद्वान् के रूप में चर्चित रहे । उनके दोहों में आज के प्रश्न भी खोजे जा सकते हैं । अपरिग्रह एवं संतोष का इससे बड़ा उदाहरण इससे अच्छा और कोई नहीं हो सकता । यथा _ ' सांई इतना दीजिये जा में कुटुंब समाय । मैं भी भूखा न रहूँ और साधू भूखा न जाय ॥ ' यह भावना मनुष्य के व्यक्तित्व को बहुत ऊंचा उठा सकती है । आपसी वैर को भूल कर सर्व कल्याण की भावना को देखा जा सकता है ।

ज्ञान के साथ-साथ प्रेम के स्वरूप का चित्रण भी कबीर की विशेषता है । ढ़ाई आखर प्रेम का पढ़े सो पंडित होय , यदि उसने यह नहीं पढ़ा और अनेक पोथियाँ पढ़ लीं तो वह सब कुछ निर्मूल है । प्रेम न बागवानी से पैदा किया जा सकता है और प्रेम बाजार में भी नहीं मिल सकता । राजा-प्रजा जिसकी भी इच्छा हो वह अपने सीस को देकर इसे ले जा सकता है । अर्थात प्रेम के लिए अपने अहंकार और अस्तित्व को नष्ट करना पड़ता है ।

मानवता के सर्वकल्याणकारी रूप की कबीर प्रस्तुति करते हैं । परम स्वरूप की खोज भी अंतर - साधना द्वारा उपलब्ध की जा सकती है । ' कस्तूरी कुंडली बसे मृग ढूंढे बन माहीं । ऐसे घाट-घाट राम हैं , दुनिया देखे नाहीं ॥ ' परम प्रिय की अनुभति का रूपक अनुपम है _ ' नैना अंतर आव तूं , त्यों ही नैन झपेऊँ । ना देखूँ और को ना तुझ देखन देऊँ ॥ ' कबीर का चिंतन और दर्शन सार्वकालिक एवं सार्वभौमिक है । वह सदा चिरन्तन सत्य की व्याख्या एवं प्रस्तुति करते हैं । भक्ति , कर्म और ज्ञान की प्रस्तुति से युक्त ही उनका काव्य है ।&&&&&&&&&&&&&



क्रोध का अंत पश्चाताप में

क्रोध का अंत पश्चाताप में होता है और उसका समाधान प्रायश्चित में 

क्रोध एक मानसिक विकृति है एवं यह एक मनोवेग है । क्रोध अपेक्षा से जन्म लेता है और वह उपेक्षा के कारण विकसित होता है । अपेक्षा चाह है और उसकी पूर्ति न होना ही उपेक्षा हो जाती है । एक रूप से जब अहंकार पर चोट पडती है , तब क्रोध उत्पन्न हो जाता है । क्रोध के कारण रक्त -प्रवाह बढ़ जाता है और अनेक रासायनिक परिवर्तन होने लगते हैं । क्रोध में चेहरा लाल हो जाता है और हृदय की धड़कन बढ़ जाती है । व्यक्ति की मुस्कराहट में क्रोध जन्म नहीं ले पाता । क्रोध का अंत पश्चाताप में होता है और उसका समाधान प्रायश्चित में होता है ।

क्रोध की अवस्था में शांत रहने का प्रयास रहना चाहिए और उस क्रोध का रूपांतरण या दिशा-परिवर्तन का प्रयास करना चाहिए । स्थान से हटने के साथ-साथ पर्याप्त जल का भी सेवन करना चाहिए । क्रोध विनाश का कारण है तथा उससे बचने का निरंतर प्रयत्न करना चाहिए ।

 पारिवारिक जीवन में भी अशांति का प्रमुख कारण क्रोध ही है। क्रोध व्यक्ति का सबसे बड़ा शत्रु है । क्रोध व्यक्ति को अंदर से खोखला कर देता है । व्यक्ति को आग के समान ही जला कर भस्म कर देता है । क्रोध के कारण ही चिंता का जन्म होता है । चिता तो मरे हुवे को जलाती है , जबकि चिंता तो जीवित व्यक्ति को ही भस्म कर डालती है । अत: तनाव और विषाद से मुक्त रहकर क्रोध रहित रहने का प्रयास करना चाहिए । क्रोध का मन का ही भाव है और मन के स्वभाव को थोडा-सा परिवर्तित कर मनोवेग से बचा जा सकता है । नजर बदलते ही नजारा भी बदलता है । दृष्टिकोण में परिवर्तन करके दृष्टि को रूपांतरित किया जा सकता है । कामना की पूर्ति न होने पर क्रोध का जन्म होता है और क्रोध ही बुद्धि का विनाश कर देता . *******************

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आत्म - तत्व तो कुंडली के समान अपने ह्रदय में

आत्म - तत्व तो कुंडली के समान अपने ह्रदय में विद्यमान 


अपने को पहचानना ही आत्म - तत्त्व है . वेद में ' आत्मानं विद्धि ' के माध्यम से अपनी स्थिति को स्वीकार करने को कहा गया है . स्वयं की शक्तियों को जानना और उनको आत्म - कल्याण एवं सर्व- कल्याण में लगाना ही आत्म -तत्त्व की सही स्वीकृति है . आत्म -तत्त्व सहज स्वीकृति एवं नित्य व शाश्वत है . यह एक ऐसी सुगंध है , जो सुयश को प्रदान करती है . यह परिवेश को खुशनुमा बना देती है . गीता में आत्मा को अजर , अमर एवं शाश्वत बताया गया है . इस आत्म-तत्व के माध्यम से ही शरीर मन , प्राण और आत्मा को पहचाना जा सकता है .
वास्तव में हमारे शरीर और ज्ञानेन्द्रियों का सम्बन्ध मन से होता है और मन का सम्बन्ध बुद्धि से तथा बुद्धि का आत्मा से होता है . इसके बाद आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से होता है . आत्म - तत्त्व के विकास से हम मन और बुद्धि में संतुलन बनाकर अपने सामर्थ्य को बढ़ा सकते हैं . आत्म -तत्त्व ही हमें मन के माध्यम से हित - अहित का ज्ञान कराकर सद मार्ग की ओर प्रेरित करता है . तभी तो ' असतो मा गमय ' , ' तमसो मा ज्योतिर्गमय ' , ' मृत्युर्मा अमृतं गमय ' आदि की प्रार्थना की गयी है . यह भाव लोक - हित एवं जन - कल्याण की ओर प्रेरित करता है . इससे परमात्मा का मार्ग प्रशस्त होता है .

सत्य यह है कि आत्म -तत्त्व को खोजा नहीं जाता है , अपितु वह अंतर में प्राप्त होता है . कबीर ने भी स्पष्ट किया है कि आत्म - तत्व तो कुंडली के समान अपने ह्रदय में विद्यमान रहता है और उसे संसार में इधर -उधर खोजने की भी आवश्यकता नहीं है . ********