गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013

मनुष्य में चन्दन जैसे गुण होने चाहिएं

सद-गुणों के विकास का उचित मार्ग यह है कि उन्हीं के सम्बन्ध में विशेष रूप से विचार किया करें  


मनुष्य के पास सबसे बड़ी पूंजी सद -गुणों की है। जिसके पास जितने सद-गुण हैं , वह उतना ही धनी है। सद-गुणों की पूंजी से किसी भी दिशा में अभीष्ट प्रगति की जा सकती है। जिसके सद-गुणों की पूंजी भरी पड़ी है , आत्म-बल और आत्म-विश्वास उसे दैवी सहायता की तरह सदा प्रगति का मार्ग दिखाते हैं। दूसरों को प्रभावित करने और अपनी सफलता का प्रधान कारण तो अपने सद-गुण ही होते हैं। सद-गुणों के विकास का उचित मार्ग यह है कि उन्हीं के सम्बन्ध में विशेष रूप से विचार किया करें, वैसा ही पढ़ें, वैसा ही सुनें, वैसा ही कहें, वैसा ही सोंचें जो सद-गुणों को बढ़ाने में , सत्प्रवृत्तियों को ऊंचा उठाने में सहायक हों। सद-गुणों के अपनाने से अपने उत्थान और आनन्द का मार्ग कितना प्रशस्त हो सकता है, इसका चिन्तन और मनन करना चाहिए।


अपने अंदर सद्गुणों के जितने बीजांकुर दिखाई पड़ें , जो अच्छाईयाँ और सत्प्रवृत्तियाँ दिखाई दें , उन्हें खोजता रहना चाहिए। जो मिलें उन पर प्रसन्न होना चाहिए। सद-गुण यदि थोड़ी मात्रा में भी अपने अंदर मौजूद हैं तो भविष्य में उनका विकास होने पर अपना भाग्य और भविष्य बहुत उज्ज्जव्ल होने की कोशिश सहज ही की जा सकती है। संसार में कोई विभूति ऐसी नहीं है जो तीव्र आकांक्षा और प्रबल पुरुषार्थ के आधार पर प्राप्त न की जा सकती हो।

एक राजा को एक दिन स्वप्न में एक साधू ने बताया कि कल रात को एक विषैले सर्प के काटने से तेरी मृत्यु हो जाएगी। वह सर्प तुम्हारा पूर्व जन्म का शत्रु है और अमुक पेड़ की जड़ में रहता है। प्रात:काल राजा सोकर उठा। विचार करने लगा कि आत्मरक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए ? राजा को विश्वास था कि उसका स्वप्न सच्चा है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार का निश्चय किया। संध्या होते ही पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शैया तक फूलों का बिछोना बिछवा दिया, मीठे दूध के कटोरे जगह-जगह रखवा दी और सेवकों से कह दिया कि सर्प आए तो कोई उसे किसी प्रकार का कष्ट न दे। रात्रि के समय सर्प जैसे -जैसे राजा के महल कि तरफ बढ़ता गया , उसका क्रोध कम होता गया। भलमनसाहत और सद्व्यवहार ऐसे प्रबल अस्त्र हैं , जिनसे बुरे से बुरे स्वभाव के दुष्ट मनुष्यों को भी परास्त होना पड़ता है। 


लोग गुणों की पूजा करते हैं, व्यक्ति की नहीं। सच्चाई को सिर झुकाते हैं , बनावटीपन को नहीं। टेसू का फूल देखने में बड़ा आकर्षक होता है, किन्तु लोग गुलाब की सुवास को ही अधिक पसंद करते हैं। हम में यदि सद-गुणों का विकास होगा तो आप अवश्य ही प्रशंसा के पात्र होंगे। हमारा कोई एक गुण सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों से जितना अधिक होगा , उतना ही हमें अधिक यश मिलेगा। गुण देखें , गुणों की चर्चा करें , गुणवानों को प्रोत्साहित करें तो अपना यह स्वभाव दूसरों के लिए ही नहीं अपितु अपने लिए भी परम मंगलमय सिद्ध हो सकता है।

सुकरात बहुत ही कुरूप थे , फिर भी वे सदा दर्पण पास रखते थे और बार-बार मुंह देखते थे। एक मित्र ने कारण पूछा , तो उन्होंने कहा कि , " सोचता हूँ , इस कुरूपता का प्रतिकार मुझे अधिक अच्छे कार्यों से सुन्दरता बढ़ाकर करना चाहिए। इसी बात को याद रखने में दर्पण से सहायता मिलती है। " दूसरी और एक बात सुकरात ने कही , " जो सुंदर हैं, उन्हें भी बार-बार दर्पण देखना चाहिए और सीखना चाहिए कि ईश्वर प्रदत्त सौन्दर्य पर कहीं दुष्प्रवृत्तियों के कारण दाग-धब्बा न लग जाए। " इनका मत था -- " मनुष्य में चन्दन जैसे गुण होने चाहिएं, सुडौल हो या बेडौल , बिखेरें सुगंध ही।" वस्तुत: सुगंध एवं सद्गुण ही जीवन की प्रगति एवं प्रस्तुति के परिचायक हैं।&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&&


प्राण जाएँ पर वचन न जाई

मृदु का भाव मार्दव , मान का मर्दन करने वाला एवं दया-धर्म का मूल  


मृदु का भाव मार्दव है। मार्दव धर्म संसार के क्लेशों का नाश करने वाला है। मान का मर्दन करने वाला एवं दया-धर्म का मूल है। विमल एवं सर्वजीवों का हितकारक है। गुण-गणों में सारभूत है। इस मार्दव धर्म से ही सकल व्रत और संयम सफल होते हैं। मार्दव धर्म मन के कषाय और कल्मष को दूर करता है। यह पांच इन्द्रिय और मन का निग्रह करता है । चित्तरूपी पृथ्वी के आश्रय से करुणारूपी बेल मार्दवरूपी धर्म पर फ़ैल जाती है। मार्दव धर्म जिनेन्द्र देव की भक्ति को प्रकाशित करता है। मार्दव धर्म कुमति के प्रसार को रोक देता है। इससे बहुत अधिक विनय-गुण प्रवृत्त होता है और इस धर्म से मनुष्यों का वैर दूर हो जाता है।


मार्दव सभी दोषों का निवारण करता है और यही जीवों को जन्म- सागर से पार करने वाला है। जाति आदि मदों के आवेशवश होने वाले अभिमान का अभाव करना मार्दव है। यह आठ प्रकार के मद से रहित है और चार प्रकार की विनय से संयुक्त है। इंद्र नाम का विद्याधर इंद्र के समान वैभवशाली था फिर भी रावण के द्वारा पराजय को प्राप्त हुवा है और रावण भी एक दिन मान के वश में नष्ट हो गया, अत: मान से क्या लाभ ? जाति, कुल, बल, ऐश्वर्य, रूप, तप, विद्या और धन इन आठ मदों के आश्रय से जो मान करते हैं , वे तत्काल नीच गति के कारण भूत कर्मों का संचय करते हैं। मानी पुरुष मान के वश होकर पूज्य-पूजा का व्यतिक्रम कर देते हैं। इस संसार में मान किसका करना ? जहाँ पर प्राणी राजा होकर विष्ठा में कीड़ा हो गया। विनय के चार भेद हैं --- ज्ञान, दर्शन, चरित्र और उपचार।

अत: जाति , कुल आदि के घमंड को छोड़कर मार्दव धर्म धारण करना चाहिए। मार्दव धर्म के प्रसाद से उच्च गोत्र का आस्रव होता है। श्री रामचंद्र ने अपने कुल का गर्व अर्थात मिथ्या अभिमान नहीं किया, अपितु गौरव रखा। आज भी कहते हैं कि ---" रघुकुल रीति सदा चली आई। प्राण जाएँ पर वचन न जाई॥ " 







हम मनु की सन्तान हैं --"मनु अपत्यं मानव: "। अत: हमारा कर्त्तव है कि हम मानवता को अपनाएं। जो सदैव अपने कुल , जाति और धर्म का गौरव रखते हुवे गर्व का त्याग करते हैं , वे ही अपने स्वाभिमान की रक्षा करके इस लोक में सर्वमान्य होते हैं तथा परलोक में उच्च कुल में जन्म लेकर मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं। उच्च जाति , गोत्र और क्रिया आदि शुक्ल ध्यान के हेतु माने गये हैं। इसलिए उच्च वर्ण अर्थात महान साधकों को मोक्ष के लिए कारण सामग्री हेतु मान कषाय और कल्मष को छोड़कर विनय का आश्रय लेकर मार्दव धर्म को हृदय में स्थान देना चाहिए।********************



मायावी पुरुष के व्रत और तप सब निरर्थक

 ऋजु अर्थात सरलता का भाव आर्जव है 


जैसा अपने मन में विचार किया जाए , वैसा ही दूसरों से कहा जाए और वैसा ही कार्य किया जाए। इस प्रकार से मन-वचन-काय की सरल प्रवृत्ति का नाम ही आर्जव है। ऋजुता से ही आर्जव की स्थिति है। यह धर्म का उत्तम लक्षण है तथा यह मन को स्थिर करने वाला है एवं सुख का उत्पादक है। इसलिए इस भव में आर्जव धर्म का आचरण और पालन करना चाहिए। मन से माया के समस्त शूलों को निकाल देना चाहिए। मायावी पुरुष के व्रत और तप सब निरर्थक हैं।

 यह आर्जव भाव ही मोक्षपुरी का सीधा उत्तम मार्ग है। आर्जव धर्म परमात्मा-स्वरूप है, संकल्पों से रहित है, चिन्मय आत्मा का मित्र है, शाश्वत और अभयरूप है। जो निरंतर उसका ध्यान करता है , वह संशय का त्याग कर देता है और पुन: अचल पद को प्राप्त कर लेता है।

मन-वचन-काय की सरलता का नाम आर्जव है। अर्थात मन-वचन-काय को कुटिल नहीं करना है। ऋजु अर्थात सरलता का भाव आर्जव है। अन्यथा मायाचरण से अनन्तों कष्टों को देने वाली तिर्यंच योनि मिलती है। दुर्योधन ने पांडवों के प्रति मायाचरण करके लाख के घर में उन्हें भेजा, पुन: लोभी ब्राह्मण को धन देकर उस मकान में आग लगवा दी। पांडव अपने पुण्य से बच निकले। किन्तु दुर्योधन की निंदा आज तक हो रही है। अत: मायाचरण का त्याग करके सरल परिणामों द्वारा अपनी आत्मा की उन्नति और ऊर्ध्वगति करनी चाहिए।

शौच -धर्म--- यह शौच धर्म मन की शुद्धि से होता है। शौच-धर्म वचन रूपी धन की बुद्धि की दृढ़ पकड़ से होता है। शौच धर्म कषायों और कल्मषों के अभाव से होता है और यह शौच धर्म जीवों को पापों से लिप्त नहीं करता है। शौच धर्म लोभ का वर्जन करता है शौच धर्म उत्तम तप के मार्ग में लगाता है। उत्तम शौच धर्म ब्रह्मचर्य के धारण करने से होता है। शौच धर्म आत्मा के गुणों को सतत मनन करने से होता है। यह धर्म शल्यों के त्याग करने से होता है और यह धर्म निर्मल भावों के ग्रहण करने से होता है। संसार को अनित्य समझकर एकाग्र मन से इसका पालन करना चाहिए। यह सुख के मार्ग का सहायक और शिवपद का दायक है। शुचि पवित्रता का भाव शौच है।

शुद्धि के मख्य रूप से दो भेद हैं -- बाह्य और आभ्यन्तर जल आदि से बाह्य शरीर आदि के मल का नाश होता है और लोभ कल्मष आदि के त्याग से अन्तरंग की पवित्रता होती है। गंगा आदि तीर्थों में स्नान से यदि पाप-मल धुलते होते तो सारे मगरमच्छ मोक्ष चले जाते। पापमल को धोने के लिए धर्म-तीर्थ में ही स्नान करना होगा। निर्धन धन को प्राप्त न करके दुखी होते हैं और धनी लोग भी तृप्त न होकर दुखी रहते हैं। बड़े कष्ट की बात है कि संसार में सभी दुखी हैं, बस एक साधू ही सुखी है। आशारूपी भावना इतनी विशाल है कि उसमें सारा विश्व अणु के समान प्रतीत होता है। फिर बताओ यदि सब को इस विश्व का बंटवारा करके दिया जाए तो किसके हिस्से में कितना भाग आएगा ?


भूमि से निकला हुवा जल शुद्ध है, पतिव्रता स्त्री पवित्र है। धर्म में तत्पर राजा भी पवित्र है और ब्रह्मचारी-गण सदा ही पवित्र रहते हैं। साधक स्नान आदि करते हैं और धर्म के द्वारा आत्मा की भी शुद्धि करते हैं। तृष्णा रूपी अग्नि को संतोषरूपी जल से ही शांत किया जा सकता है। जो ग्रहण करने की इच्छा करने वाले हैं वे नीचे गिरते हैं। और जो अनासक्त रहते हैं वे ऊंचे उठते हैं। जैसे तुला के दो पलड़ों में से जिसमें अधिक भार होता है तो वह नीचे जाता है और हल्का पलड़ा ऊपर उठ जाता है। इन सब उदाहरणों को समझकर अपनी आत्मा को शौच धर्म द्वारा पवित्र और शुद्ध बनाना चाहिए।*******************


सत्य बोलिए पर वह हितकारी हो

सत्य बोलने वाले लोगों की वचन-सिद्धि हो जाया करती है। 


सत्य बोलिए पर वह हितकारी हो 

सत्य-धर्म, दया-धर्म का कारण है। दोषों को दूर करने वाला है। इस लोक और परलोक में सुख को देने वाला है। लोक में सत्य-वचन से किसी की तुलना नहीं की जा सकती, इसे विश्वास के साथ बोलना चाहिए। सत्यधर्म सर्वधर्मों में प्रधान है। सत्य पृथ्वी-तल पर सर्व श्रेष्ठ विधान है। सत्य, संसार सागर को पार करने के लिए पुल के समान है और यह सब जीवों के मन को सुख देने वाला है। इस सत्य से ही मनुष्य जन्म शोभित होता है। सत्य से ही पुण्य-कर्म बंधता है। सत्य से ही देवगण सेवा करते हैं। सत्य से अणुव्रत और महाव्रत होते हैं। सत्य से आपत्तियां नष्ट हो जाती हैं। नित्य ही हित-मित वचन बोलना चाहिए

हे मनुष्य ! दूसरों को बाधा-पीड़ा करने वाले वचन कभी मत बोलो। यदि वे वचन सत्य भी हों तो भी गर्वरहित हो उसे छोड़ दो, क्योंकि सत्य ही एक मात्र पररमात्मा है। वह भवरूपी अंधकार को दलन करने के लिए सूर्य के समान है। अत: उस सत्य की नित्य ही भावना करो। सत अर्थात समीचीन वचन सत्य कहलाते हैं। ये वचन अमृत से भरे हुवे हैं। मीठा प्रलाप करने वाले और धर्मशून्य वचन सदा छोडो। गर्हित, निन्दित, हिंसा, चुगली, अप्रिय, कठोर, गाली-गलौज, क्रोध, वैर आदि के वचन, आगम-विरुद्ध वचन इन सबको छोडो।

असत्यवादी लोग अपने गुरु, मित्र और बन्धुओं के साथ भी विश्वासघात करके दुर्गति में चले जाते हैं, किन्तु सत्य बोलने वाले लोगों की वचन-सिद्धि हो जाया करती है। क्रमश: सत्य के प्रभाव से दिव्य ध्वनि के स्वामी होकर असंख्य प्राणियों को धर्म का उपदेश देकर मोक्ष मार्ग का प्रणयन करते हैं। इसलिए सत्य -धर्म का आदर करना चाहिए।

संयम --- इस संसार में संयम धर्म दुर्लभ है। जो प्राप्त कर उसे छोड़ देता है , वह मूढ़मति है। वह जरा-मरण के समूह से व्याप्त इस संसाररूपी वन में परिभ्रमण करता रहता है, पुन: वह सुगति को कैसे प्राप्त कर सकता है। पाँचों इन्द्रियों के दमन से संयम होता है, कल्मषों का निग्रह करने से संयम होता है और इस परित्याग के विचार-भावों से संयम होता है। दुर्धर तप के धारण से संयम होता है। सभी जीवों की रक्षा से संयम होता है, सत तत्त्वों के परीक्षण से संयम होता है। काययोग के नियंत्रण से संयम होता है और बहुत गमन के त्याग से संयम होता है। किसी पर कृपा करने से भी संयम होता है। परमार्थ तत्त्व पर विचार करने से भी संयम होता है, संयम का अर्थ नियंत्रण या कंट्रोल है। जब हमारा ध्यान इन सब पर लहता है तो मन संयमित हो जाता है, तब इधर-उधर न भागकर सही दिशा की ओर चलता है। सच है कि यदि संयम का महत्त्व नहीं होता तो बड़े-बड़े राजा , महाराजा आदि तपस्वी को प्रणाम क्यों करते?


तप --- वह है जहाँ संग्रह अथवा परिग्रह का त्याग किया जाता है। योग में अपरिग्रह को विशेष महत्त्व दिया गया है। तप वह है जहाँ काम को भी नष्ट कर दिया जाता है। तप वह है जहाँ रागादि भाव को जीता जाता है। तप वह है जहाँ भिक्षा-वृत्ति से भोजन किया जाता है। तप वह है जहाँ अपने स्वरूप का चिन्तन किया जाता है। तप वह है जहाँ कर्मों का नाश किया जाता है। इससे परम तत्त्व की प्राप्ति की जा सकती है। परम बल को जीतना ही तप है। परम बल से ही माधव रूप प्राप्त किया जा सकता है. *********


जल्दबाजी से काम बिगड़ता है।

यदि मन को साध लिया तो इन्द्रियां अपने आप रुक जाती हैंइस प्रकार प्रत्याहार से इन्द्रियां अत्यंत वश में हो जाती हैं 





अपने- अपने विषयों के संग से रहित होने पर , इन्द्रयों का चित्त के रूप से अवस्थित हो जाना ' प्रत्याहार ' है। प्रत्याहार के सिद्ध होने पर प्रत्याहार के समय साधक को बाह्य ज्ञान नहीं होता , क्योंकि व्यवहार के समय साधक को बाह्य ज्ञान रहता है। अत: व्यवहार के समय साधक शरीर - यात्रा के हेतु से प्रत्याहार को काम में नहीं लाता। अन्य किसी साधन से यदि मन का निरोध हो जाता है , तो इन्द्रियों का निरोधरूप प्रत्याहार अपने आप ही उसके अंतर्गत आजाता है--- ततपरमा वश्यते इन्द्रियानाम " । इस प्रकार प्रत्याहार से इन्द्रियां अत्यंत वश में हो जाती हैं, अर्थात इन्द्रियों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार प्रत्याहार इन्द्रियों को संसार की ओर लौटा कर, उन्हें परमात्मा की ओर उन्मुख करता है। इन्द्रियों क़ा यह स्वभाव होता है कि वे बाहर की ओर दौडती रहती हैं। शरीर के अन्दर आत्मा सदा रहता है। पर वे उसकी ओर नहीं देखती।







प्रकृति का एक नियम है , जो वस्तु जिस जाति की होती है , उसी से मिलकर वह पूर्णता का अनुभव करती है। इन्द्रियां भौतिक हैं , बाहर के पदार्थ भी भौतिक हैं , दोनों सजातीय हैं , इसलिए इन्द्रियां उन पदार्थों की ओर दौडती हैं। जिस इन्द्रिय का जो भोजन है , उसे समेट कर , अपने स्वामी मन को सौंप देती हैं। इन्द्रियां द्वार हैंउन्हीं में से होकर विषय प्रवेश करते हैं। अत: इन्द्रियों के सम्बन्ध में बहुत सावधानी बरतनी चाहिए। ये अपने आप कुछ नहीं करतीं , इनका स्वामी मन है, यदि मन को साध लिया तो इन्द्रियां अपने आप रुक जाती हैं मन शांत हुवा तो इन्द्रियां स्वत: शांत हो जाएँगी। साथ में बुद्धि में भी परिवर्तन लाना होगा। बुद्धि स्वामिनी है और मन उसका सेवक है। बुद्धि पारदर्शिनी होनी चाहिए। वह आत्मा के सर्वथा निकट है। अत: सूक्ष्म बुद्धि के द्वारा ही आत्मा का साक्षात्कार होगा। पहले आत्मा को सुनना पड़ेगा , फिर मनन करना पड़ेगा , फिर बुद्धि से परम- प्रकाश का ध्यान करना पड़ेगा। यदि बुद्धि ने धर्म में स्नान कर लिया तो मन इन्द्रियां , शरीर , प्राण ये सब पवित्र हो जायेंगे तथा तब कर्म भी पवित्र होगा। यदि आप परमात्मा का चिंतन करेंगे तो परमात्मा भी आपका चिंतन करेगा। आप बाहर भटक गये थे फिर स्थान पर लौट आये तो यही प्रत्याहार का फल है।


अनेक जन्मों तक सेवन करने से जिनका अभ्यास बन गया है , उन्हें हटाने के लिए जल्दी मत करो। भोजन को यदि तेज अग्नि पर पकाओगे , तो वह जल जायेगा। कर में एकाएक ब्रेक लगेगा , तो वह उलट जाएगी। दूध को यदि तेज आंच पर गर्म करोगे वह उफन जायेगा। इन सब कर्मों में धैर्य की आवश्यकता होती है। जल्दबाजी से काम बिगड़ता है। इन्द्रियां संसार से लौटें , मन परमात्मा की ओर हो जाये , उसी का मनन - चिंतन करे तो यही प्रत्याहार है। *************************




बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

आहार, निद्रा, भय और मैथुन का सम्यक पालन

मानव- जीवन का उद्देश्य आत्म- साक्षात्कार है 



वैदिक- कल्पतरु के रूप में हम जो भी ज्ञान-प्राप्त करने की कामना करें, वेदों से उसे प्राप्त कर सकते हैं। वेद का अर्थ ज्ञान है। यह इतना परिपूर्ण है कि चाहे हम इस भौतिक जगत या आध्यात्मिक जगत का आनंद प्राप्त करने की इच्छा करते हों , दोनों प्रकार का ज्ञान यहाँ उपलब्ध है। यदि हम वैदिक सिद्धांतों का पालन करें तो हम सुखी हो सकते हैं। वे राज्य की आचार- संहिताओं की तरह हैं। यदि नागरिक इनका पालन करें तो वे सुखी हो जायेंगे राज्य हमें कष्ट देने के लिए नहीं है, परन्तु हम यदि राज्यों का नियमों का पालन करें तो दुःख का कोई प्रश्न ही नहीं रहेगा। इसी प्रकार यह बद्ध- जीव प्राणी , यहाँ इस भौतिक जगत में आनंद और भौतिक सुख के लिए आया है तथा वाद हमारे पथ- प्रदर्शक हैं। ठीक है आनंद कीजिए , परन्तु हमें आनंद इन्हीं वैदिक सिद्धांतों के आधार पर ही करना होगा। इसी को वेद कहते हैं। इसीलिए यहाँ सबकुछ उपलब्ध है।



वेदों में विवाह पद्धति का का उल्लेख मिलता है। विवाह - पद्धति के अनुसार स्त्री- पुरुषों के साथ रहने एवं उनके यौन- जीवन का वर्णन है। उन्हीं नियमों के अनुसार ही व्यक्ति सुखी हो सकता है। अंतिम उद्देश्य सुखी होना है। आहार, निद्रा, भय और मैथुन का सम्यक पालन आवश्यक है। इन नियमों का पालन करते हुवे ही सुख की सच्ची स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं। यह एक भ्रान्ति है कि भौतिक जीवन जीवात्मा के लिए नहों है। यदि हम भौतिक जीवन का उपभोग करना चाहते हैं तो ठीक है, पर यह अंतिम परिणति नहीं है। अन्ततोगत्वा हम यह समझ लें कि यह जीवन हमारे लिए उचित नहीं है। हमारे लिए आध्यात्मिक जीवन ही उचित है।


 ज्यों ही हम , मैं ब्रह्म हूँ , इस आध्यात्मिक स्थिति को जान लेते हैं उसके उपरांत ही हमारा मानव जीवन पूर्ण होता है। अन्यथा हम अपने आध्यात्मिक जीवन की चिंता नहीं करेंगे तो परिणाम यह होगा कि हमारा जीवन पशु के समान ही हो जाएगा। यह सम्भावना है कि अगले जन्म में हम पशु- योनि को ही प्राप्त करें और हमने पशु- योनि को प्राप्त कर लिया तो इस मानव - जीवन को प्राप्त करने के लिए लाखों- करोड़ों वर्ष लग जाएगें। इसलिए मानव- जीवन का उद्देश्य आत्म- साक्षात्कार है। तथा वेद इस सन्दर्भ में पथ- प्रदर्शक हैं।

 वेदों को चार भागों में विभाजित किया गया है --- ऋक, साम, अथर्व और यजु:। फिर १०८ उपनिषदों में इस ज्ञान की विषद व्याख्या कि गयी है। साथ ही वेदांत सूत्रों में भी इस ज्ञान सार रूप में प्रस्तुत क्या गया है। श्रीमदभगवद्गीता में आध्यात्मिक ज्ञान की सागार्भित चर्चा प्राप्त होती है। मूल रूप से वेद ही इसका आधार है, वैदिक कल्पतरु इच्छादायी फल को देने वाला कहा जा सकता है।**********